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Saturday, 28 July 2012

कौन थे जय प्रकाश ?

शिशिर शुक्ला


आज 11 अक्टूबर को भले ही महानायक कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन का जन्म दिन हो मगर हम बात कर रहे हैं हमारे देश के असली महानायकों में से एक लोक नायक जय प्रकाश नारायण की, उनका जन्म दिन भी आज ही के दिन है।  जय प्रकाश नारायण ने अमिताभ बच्चन या उनके जैसे फिल्मी कलाकारों की तरह भले ही कैमरे के सामने बड़े-बड़े संवाद नहीं बोले हों, मगर उन्होंने जुल्म, ज्यादतियों और अत्याचारों के खिलाफ एक असली लड़ाई लड़ी, पुलिस की असली लाठियाँ खाई और इस देश में एक क्रांतिकारी सोच रखने वाली पीढ़ी तैयार की। दुर्भाग्य से जय प्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति के आंदोलन से जुड़े तमाम लोग सत्ता हासिल करने के बाद भ्रष्टाचार, बेईमानी और अपराधियों के साथ साँठ-गाँठ के आरोपों से घिरे हुए हैं। 


जयप्रकाश नारायण (11 अक्टोबर, 1902 - 8 अक्टोबर, 1979) भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और राजनेता थे। लोग उनको प्यार से  जेपी कहकर बुलाते थे। 1970 में उन्होंने  इंदिरा गांधी की सरकार के खिलाफ ज़बर्दस्त आवाज उठाई और देश में सपूर्ण क्रांति का शंखनाद किया।
जयप्रकाश नारायण का जन्म बिहार के छपरा जिले के सिताबदियारा नामक गाँव में दशहरे के 11 अक्टूबर सन 1902 को हुआ था। इनके बाबा का नाम श्री देवकी बाबू था तथा पिताश्री हरसू दयाल थे। जयप्रकाश जी की माता फूलरानी देवी धर्म परायण महिला थी। तीन भाई और तीन बहनों में जयप्रकाश जी चौथे स्थान पर थे। इनके बड़े भाई और एक बहन की बचपन में ही मृत्यु हो गई थी। पाँच साल की उम्र में उनको  गाँव के प्राथमिक विद्यालय में  भर्ती कराया गया। गाँव की पढ़ाई समाप्त करने के बाद बालक जयप्रकाश को पटना कालेजिएट स्कूल के चौथी कक्षा में भर्ती कराया गया।  वहाँ वे  सरस्वती भवन नामक होस्टल में रहे। एक दिन अंग्रेज हेड मास्टर रक्षाबंधन के दिन परीक्षा रख दी, लेकिन बालक जय प्रकाश और उनके साथी परीक्षा देने नहीं गए।  उनका कहना था कि यह दिन स्कूल का नहीं बल्कि बहन के लिए होता है।  अगले दिन हेडमास्टर ने जब उनको सजा देने के लिए बुलाया तो इस बालक के चेहरे पर मासूमियत और आत्मविश्वास के भाव देखकर उसे खुद अपनी गलती का अहसास हुआ और उसने उन्हें पीटने के लिए ली गई बेंत बस छुआकर अपनी सजा पूरी कर दी।  1919 में जयप्रकाश ने दसवीं की परीक्षा प्रथम श्रेणी से उतीर्ण की और इसके बाद कॉलेज की पढ़ाई के लिए विश्वविद्यालय में आ गए। 
पटना मे अपने विद्यार्थी जीवन में जयप्रकाश नारायण ने स्वतंत्रता संग्राम मे भी भाग लिया और जेल भी गए। 1922 मे वे उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका गए, जहाँ उन्होंने 1922-1929 के बीच कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय-बरकली, विसकांसन विश्वविद्यालय में समाज-शास्त्र का अध्यन किया। पढ़ाई का खर्च चलाने के लिए उन्होंने खेतों में ट्रेक्टर चलाने से लेकर रेस्ताराओं में भी काम किया। जीवन भर शाकाहारी रहे जय प्रकाश नायरायण को अमरीका में गायों के कत्लखाने में भी काम करना पड़ा था। उन्होने एम.ए. की डिग्री प्राप्त की लेकिन गाँव में माताजी की तबियत ठीक न होने की वजह से वे 1929 में भारत वापस आ गए और पी.एच.डी की आस अधूरी रह गई। उनका विवाह बिहार के मशहूर गांधीवादी बृज किशोर प्रसाद की पुत्री प्रभावती के साथ 1920 मे हुआ। प्रभावती विवाह के उपरांत कस्तुरबा गाँधी के साथ गाँधी आश्रम मे रहीं।
१९२९ में जब वे अमेरिका से लौटे, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम तेज़ी पर था। उनका संपर्क गाधी जी के साथ काम कर रहे जवाहर लाल नेहरु से हुआ। वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा बने। 1932 मे गांधी, नेहरु और अन्य महत्वपूर्ण कांग्रेसी नेताओ के जेल जाने के बाद, उन्होने भारत मे अलग-अलग हिस्सों मे संग्राम का नेतृत्व किया। अन्ततः उन्हें भी मद्रास में सितंबर 1932 मे गिरफ्तार कर लिया गया और नासिक के जेल में भेज दिया गया। यहाँ उनकी मुलाकात एम. आर. मासानी, अच्युत पटवर्धन, एन. सी. गोरे, अशोक मेहता, एम. एच. दांतवाला, चार्ल्स मास्कारेन्हास और सी. के. नारायणस्वामी जैसे उत्साही कांग्रेसी नेताओं से हुई। जेल मे इनके द्वारा की गई चर्चाओं ने कांग्रेस सोसलिस्ट पार्टी (सी.एस.पी) को जन्म दिया। सी.एस.पी समाजवाद में विश्वास रखती थी। जब कांग्रेस ने 1934 मे चुनाव मे हिस्सा लेने का फैसला किया तो जेपी और सी.एस.पी ने इसका विरोध किया।



1939 मे उन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, अंग्रेज सरकार के खिलाफ लोक आंदोलन का नेतृत्व किया। उन्होंने सरकार को किराया और राजस्व रोकने के अभियान चलाए। टाटा स्टील कंपनी में हड़ताल करा के यह प्रयास किया कि अंग्रेज़ों को इस्पात न पहुँचे। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 9 महिने की जेल की सज़ा सुनाई गई। जेल से छूटने के बाद उन्होने गांधी और सुभाषचंद्र बोस के बीच सुलह का प्रयास किया। उन्हे बंदी बना कर मुंबई की आर्थर जेल और दिल्ली की कैंप जेल मे रखा गया। 1942 भारत छोडो आंदोलन के दौरान वे आर्थर जेल से फरार हो गए।
उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हथियारों के उपयोग को सही समझा। उन्होंने नेपाल जा कर आज़ाद दस्ते का गठन किया और उसे प्रशिक्षण दिया। उन्हें एक बार फिर पंजाब में चलती ट्रेन में सितंबर 1943 मे गिरफ्तार कर लिया गया। 16 महिने बाद जनवरी 1945 में उन्हें आगरा जेल मे स्थांतरित कर दिया गया। इसके उपरांत गांधी जी ने यह साफ कर दिया था कि डा. लोहिया और जेपी की रिहाई के बिना अंग्रेज सरकार से कोई समझौता नामुमकिन है। दोनो को अप्रेल 1946 को आजाद कर दिया गया।1948 मे उन्होंने कांग्रेस के समाजवादी दल का नेतृत्व किया, और बाद में गांधीवादी दल के साथ मिल कर समाजवादी सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की। 19 अप्रेल, 1954 में गया, बिहार मे उन्होंने विनोबा भावे के सर्वोदय आंदोलन के लिए जीवन समर्पित करने की घोषणा की। 1957 में उन्होंने लोकनिति के पक्ष मे राजनिति छोड़ने का निर्णय लिया।
1960 के दशक के अंतिम भाग में वे राजनिति में पुनः सक्रिय रहे। 1974 में किसानों के बिहार आंदोलन में उन्होंने तत्कालीन राज्य सरकार से इस्तीफे की मांग की।
वे इंदिरा गांधी की प्रशासनिक नीतियों के विरुद्ध थे। गिरते स्वास्थ्य के बावजूद उन्होंने बिहार में सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन किया। उनके नेतृत्व में पीपुल्स फ्रंट ने गुजरात राज्य का चुनाव जीता। 1975 में इंदिरा गांधी ने आपात्काल की घोषणा की जिसके अंतर्गत जेपी सहित ६०० से भी अधिक विरोधी नेताओं को बंदी बनाया गया और प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई। जेल मे जेपी की तबीयत और भी खराब हुई। ७ महिने बाद उनको मुक्त कर दिया गया। 1977 जेपी के प्रयासों से एकजुट विरोध पक्ष ने इंदिरा गांधी को चुनाव में हरा दिया।



जयप्रकाश नारायण का निधन उनके निवास स्थान पटना मे 8 अक्टूबर 1979 को हृदय की बीमारी और मधुमेह के कारण हुआ। उनके सम्मान मे तत्कालीन प्रधानमंत्री चरण सिंह ने ७ दिन के राष्ट्रीय शोक का ऐलान किया, उनके सम्मान मे कई हजार लोग उनकी शोक यात्रा मे शामिल हुए।(जीवनी के कुछ अंश विकिपिडिया से साभार)
जयप्रकाश नारायण ने चंडीगढ़ की जेल में एक कविता के माध्यम से अपनी पीड़ा यों व्यक्त की थी


जीवन विफलताओं से भरा है ,सफलताएँ जब कभी आईं निकट ,दूर ठेला है उन्हें निज मार्ग से । तो क्या वह मूर्खता थी ?नहीं । सफलता और विफलता कीपरिभाषाएँ भिन्न हैं मेरी ! इतिहास से पूछो कि वर्षों पूर्वबन नहीं सकता प्रधानमन्त्री क्या ?किन्तु मुझ क्रान्ति-शोधक के लिएकुछ अन्य ही पथ मान्य थे , उद्दिष्ट थे,पथ त्याग के , सेवा के , निर्माण के,पथ संघर्ष के , सम्पूर्ण क्रान्ति के ।जग जिन्हें कहता विफलताथीं शोध की वे मंजिलें । मंजिलें वे अनगिनत हैं ,गन्तव्य भी अति दूर है ,रुकना नहीं मुझको कहींअवरुद्ध जितना मार्ग हो ।निज कामना कुछ है नहींसब है समर्पित ईश को । तो , विफलताओं पर तुष्ट हूँ अपनी ,और यह विफल जीवनशत - शत धन्य होगा ,यदि समानधर्मा प्रिय तरुणों काकण्टकाकीर्ण मार्गयह कुछ सुगम बन जावे !