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Sunday, 27 January 2013

किसी गांव सा था वो, शहर में गुज़र गया


किसी गांव सा था वो, शहर में गुज़र गया
- चण्डीदत्त शुक्ल

गूगल पर केसी महंथ के बारे में कुछ तलाश रहा हूं। यह जानते हुए कि कुछ नहीं मिलेगा। एक भी रिजल्ट नहीं। वैसे, ये बेहद बेशर्मी, आलस्य और अपनी जड़ों से कट जाने वाली हरकत है। पर क्य़ा कहूं। ऐसा ही है। हो सकता है, कल को ये दिन भी आए कि लोग अपने मां-बाप के बारे में भी गूगल पर इन्फो तलाशने लगें। हम अपनी मिट्टी ऐसे ही भूलते जा रहे हैं। आज सुबह ही खबर मिली कि महंथ जी नहीं रहे। वो मां-बाप तो नहीं पर पता नहीं क्या-क्या थे। गोंडा में रहते हुए, जब पत्रकारिता की एबीसीडी पढ़नी चाही तो एक वही थे, जिन्होंने शुरू-शुरू में आतंक नहीं दिखाया। यह नहीं कहा था कि पत्रकार कोई तोप होते हैं, या ये कि तू चीज ही क्या है? इतने ही सीधे-सादे, सच्चे, घर-दुआर वाले प्राणी थे महंथ जी। इतने अपने कि उन्हें `थे' लिखते हुए भी तकलीफ हो रही है... पर वही महंथ साहब, अब नहीं हैं, और जब उन पर कुछ लिखने को मन कचोट रहा है तो कुछ भी याद नहीं आ रहा... न उनका जन्म, न कोई सेलेब्रिटी इन्फो। इस तरह का साधारण क्या होना कि दिखावे की दुनिया में आपके बारे में इन्फॉर्मेशन ही न मिले? कुछ तो जलवे बिखेरते, एमपी-एमएलए-मिनिस्टर-चीफ मिनिस्टर पटाते, अवार्ड-शेवार्ड हासिल करते, बंगला एलाट करवाते...। ख़ैर, महंथ साहब चले गए। गोंडा कचहरी में आपकी गुमटी के पास पुराने बूढ़े मुंशी जी तो फिर बैठेंगे और शायद कोई आपका जूनियर गद्दी संभाले, मुकदमे की पेशियां अटेंड करे, लेकिन खांटी गंवई वाली आपकी मुस्कान कहां मिलेगी?

गोंडा शहर की कुछ पुरानी-धुंधली शामें याद आ रही हैं। सिविल लाइंस में पुराने, पीले रंग का मुरझाया सा एक बड़ा बंगला। उसमें एक कमरा, जिसकी खिड़कियों से छनकर सुबह की रोशनी सकुचाते हुए अंदर आती थी और मेज़ के सामने सीधे-सधे हुए सादगी के साथ बैठे महंथ साहब। सरिता मैगज़ीन में छपे अपने लेखों और कहानियों के बारे में, बेहद विनम्रता से बताते। कोई डींग नहीं, मक्कारी नहीं, कहीं-कोई बड़प्पन नहीं। फैज़ाबाद के जनमोर्चा अखबार के ज़िला गोंडा में सर्वेसर्वा पत्रकार थे। अरसे तक रहे। 

लोग इज्ज़त करते थे उनकी। सिर्फ दिखाने के लिए नहीं। दिल से छलक उठने वाली इज्जत।
याद आता है, एक शाम कहने लगे थे - चण्डीदत्त! मक्कारी से हासिल की दौलत नहीं रुकती। ऐसी शोहरत भी नहीं टिकती। उनकी इस बात का मैंने कितना सबक लिया, क्या कहूं पर यह बात तो याद है। आज महंथ जी चले गए हैं, लेकिन उनसे फ्री में मिली पत्रकारिता की ट्रेनिंग एकदम पक्की है, जीवंत है, कभी नहीं छूटेगी। वे नहीं हैं पर वो मिट्टी बाकी है, जो फीचर राइटिंग का वज़ूद बताती है। इन दिनों पढ़ता हूं, किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम की कवरेज लिखते हुए पत्रकारों का फ़ेवरिट वाक्य होता है -- और उन्होंने मंत्रमुग्ध कर दिया... या फिर -- और उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। ऐसे मौकों पर महंथ जी की कलम से निकले शब्द चौंका देते हैं। वे लिखते थे, तो उनमें अफसाने होते थे, हमारा समय, उसकी चुनौतियां, गांव-देहात की लोक परंपरा और गीत तक। वे कटकर नहीं रचते थे, शब्द उनके साथी थे। क्योंकि उन्होंने समय जिया था। जाना था कि संबंध क्या होते हैं, क्या होती है मोहल्ले की, शहर की और हमारे कसबों की ज़िंदगी। परंपराओं की तरह होते हैं कुछ चेहरे। कुछ एहसास, कभी नहीं मरते। आप भी याद आते रहेंगे महंथ साहब। आख़िरी सलाम!

Tuesday, 22 January 2013

मुकेश कुमार की कविताएं (साभार- शुक्रवार)


हिमयुग

आज भी हिमयुग में  जमी हुई है पृथ्वी

तापहीन सूर्य असमर्थ है पिघला पाने में बर्फ

जाने कब जीवित होंगे  समय के जीवाश्म

विकास के कितने चरणों  को पार करके जीवन लेगा मानव रूप

सभ्यताएं कब पहुँचेंगी  उस मोड़ पर

जहाँ खिलते हैं  सूरज निरभ्र आकाश में

मुझसे सहा नहीं जाता ये विलंबित शीतकाल

अनगिनत अणु विस्फोटों  के ताप से प्रज्ज्वलित  मेरी देह

भस्म हो रही है

संचित हो जाएगी एक दिन हिमशिलाओं के नीचे

ज्वालामुखी बनकर
xxxxxx

सृष्टि
मरुभूमि की रेत की तरह

फैली हैं मेरी कामनाएं

एक किशोर तोड़ता है पेड़ पर चढ़कर कच्चे अमरूद

शीशे के सामने खड़ा एक अधेड़ रंग रहा है अपने बाल

यौवन की मिथ्या अनुभूति  लिए


धरती पूछती है सूर्य  से मुखातिब होकर

दोनों के होने का औचित्य

खिलखिला पड़ता है सौरमंडल

ग्रह, उपग्रह तारे सब जिज्ञासु हो उठते हैं

नथुने फड़क उठते हैं हवाओं  के

दौड़ पड़ती है वह दोगुने उत्साह के साथ


कहीं एक स्त्री सँभालते  हुए अपने वस्त्र

उठती है शैय्या से संपूर्ण  तुष्टि के साथ।
xxxxx

पत्थर

जिन्हें पूजा
हो गए पत्थर

पूजते-पूजते पत्थर
लोग भी हो गए पत्थर

देवता भी पत्थर
भक्त भी पत्थर

सब पत्थर
बस पत्थर ही पत्थर
xxxxxx

मुट्ठी

तितलियों से लेकर जंगल पहाड़ों  तक
परियों से लेकर चाँद तारों  तक
सब कुछ था नन्हीं सी बंद  मुट्ठी में

फिर जाने क्या पकड़ने दौड़े
कि फिसल गई दुनिया मुट्ठी से
रह गई उम्मीदों और सपनों  की रेत
चिपचिपाते पसीने के साथ

खुली हुई हथेली पर।
xxxxxx

तारीफ़

बहुत घातक होती है प्रशंसा
मीठे ज़हर की तरह
फैल जाती है नसों में
मदहोशी  के साथ

डाल देती है एक खुशनुमा आवरण दृष्टि पर
ओझल हो जाता है सच

आत्ममुग्धता में लीन मन
हमेशा खोजता  रहता है प्रशंसा के बोल

तारीफ़
तालियाँ
वाहवाही

रम जाता है इन्हीं में
उलटता रहता है अपनी उपलब्धियों के एलबम

बढ़ती जाती है आत्मप्रचार की भूख
कान तरसते  रहते हैं अपने बारे में  सुनने को

आँखें ढूँढ़ती  हैं पत्र-पत्रिकाओं, चैनलों में अपनी छवियाँ
मस्तिष्क  तलाश में रहता है प्रशंसा  लूटने के अवसर

बोलता रहता है अपने बारे में वह निरंतर, नि:संकोच
प्रत्यक्ष में, परोक्ष में
हर जगह  होता है वह खुद
उसकी उपस्थिति मारती है

मुर्दाघरों  जैसी सड़ाँध
सो जाती है आत्मा

बर्दाश्त  नहीं होती मामूली सी आलोचना
हर प्रतिकूल बात में दिखती है

साज़िश, पूर्वाग्रह और ईर्ष्या
इससे ख़तरनाक़ नहीं है कोई भी मौत
आप मर जाते हैं और आपको पता भी नहीं होता
ढोते रहते हैं एक मुर्दा व्यक्तित्व
मरे हुए  बच्चे को सीने से चिपटाए
बंदरिया की तरह।

मुकेश कुमार से संपर्क mukeshkabir@gmail.com के जरिए किया जा सकता है

Monday, 21 January 2013

राहुल की वेदना : राजनीति में साधारण लोगों ने प्रतिभा को ब्लाक किया


कैडर के लिए राहुल का स्पष्ट सन्देश: तुम काम करो कुर्सियां खाली होंगी
एन. के. सिंह, वरिष्ठ राजनीतिक टिप्पणीकार

जब किसी १२७ साल पुरानी और देश का आज भी सबसे बड़ी पार्टी जो लगभग ६३ साल पुरानी गणतांत्रिक व्यवस्था में पांच दशक से ज्यादा शासन में रही हो, का नवनियुक्त युवा नेता ने सिस्टम के दोष गिनाये और यह बताये  कि इस सिस्टम में बुद्धिमत्ता की जगह  सामान्यतावाद (मीडियोक्रिटी) हावी हो गयी है जिसके तहत मुट्ठी भर लोग सत्ता पर कब्ज़ा जमा कर करोड़ों लोगों की आवाज़ पर भारी पड़ रहे हैं, तो इसे समान्य भाषण की श्रेणी में रख कर विश्लेषण नहीं किया जा सकता. कांग्रेस पार्टी के नवनियुक्त उपाध्यक्ष और सेकंड-इन-कमांड राहुल गाँधी ने आगे कहा  “दिल्ली में बैठे मंत्री पंचायत द्वारा किया जाने वाला काम कर रहे है और मुख्य-मंत्री अध्यापक की नियुक्ति कर रहे हैं. पार्टी कोई भी हो क्यों मुट्ठी भर लोग समूची राजनीतिक धरातल घेरे हुए हैं”.

नेहरु-गाँधी परिवार के इस उत्तराधिकारी की बेबाकी, जिसमें पीड़ा ज्यादा थी, पारंपरिक उपदेश नादातर, जिसमे आत्म-मंथन से निकले स्व-शुद्धिकरण के उन्माद का भाव ज्यादा था और “हमारे-बनाम उनके” का छदम आरोप कम, ने कम से कम गिरते हुए राजनीतिक संवाद का स्तर एक बार फिर उठाने की कोशिश की. उनका दर्द कोई उलाहना नहीं था बल्कि यथार्थ पर आधारित तार्किक सोच का नतीजा था. लोग राहुल के भाषण में भावनात्मक विवरण को भले हीं नकारात्मक भाव से देखें लेकिन यह उस यथार्थ को बताता है जो सत्ता में मोह के साथ जुडी है. यही कारण था कि इस युवा नेता ने निर्लिप्त-भाव से सत्ता को जन सेवा का माध्यम बनाने की बात कही.

विचारधारा-विहीन राजनीतिक पार्टी की यह मूल-समस्या है. कैडर प्रतिबद्ध नहीं होता बल्कि सत्ता के मोह में आता है. उसमें प्रतिबद्धता का भाव लाने के लिए नेता को उन्हें कैडर संरचना को भविष्य में क्या-क्या मिल सकता है, का प्रलोभन देना होता है. याने कैडर को “इंसेंटिवाइज़” करना होता है. “हमें ४०  से ५० ऐसे लोग  तैयार करने है जो इस देश को चलाएंगे. ऐसे हीं हर राज्य में पांच से दस लोक ऐसे चाहिए जो मुख्य-मंत्री बनाने की काबिलियत रखते हों. सत्ता का विकेंद्रीकरण करना ज़रूरी है. आज यह बात महत्व नहीं रखती कि आप कितने योग्य है, महत्व इस बात का है कि आप सत्ता में कहाँ बैठे हैं.” सपष्टरूप से राहुल गाँधी ने कैडर को उसका भविष्य बताया और उन्हें भी जो मंच पर जुगाड़ कर के बैठे हैं या बैठे रहे हैं.

राहुल का दर्द अकारण नहीं था. हाल की कुछ बड़ी एवं ऐतिहासिक घटनाओं पर जिस तरह सरकार का रख रहा या जिस तरह औसत दर्जे की प्रतिक्रिया से ऊपर सरकारी अमला नहीं बढ़ पाया उस पर गौर करने की ज़रुरत है.

इसी मंच से देश के गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे का कहना कि भारतीय जनता पार्टी और आर एस एस के आतंकवादियों को ट्रेनिंग देने के कैंप हैं उसी मीडियोक्रिटी (सामान्यतावाद) की ओर चिल्ला –चिल्ला कर इंगित कर रहा है. एक भ्यारत ऐसे देश के गृहमंत्री को अगर भाषाई शालीनता ना मालूम हो, द्वंदात्मक प्रजातंत्र में संवैधानिक स्थितियों का ज्ञान ना हो और जो कानूनी तथ्य और मीडिया रिपोर्ट में अंतर ना जनता हो उसे मीडियाकर से नीचे का हीं मना जा सकता है. एक ऐसे मंच से जिसका उद्देश्य चिंतन हो , पोलिटिकल बकवास किया जाना वह भी सड़क छाप, अपने आप में किसी भी भावी नेता की वेदना का कारण हो सकता है.       

राहुल ने जो कुछ कहा वह आध्यात्म का मनीषी श्री औरोबिन्दो घोष ने काफी पहले कहा था और जिसे भाषांतर से ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ग्लेडस्टोन ने भी संसद में व्यक्त किया था. दोनों का मानना था कि व्यस्क मताधिकार पर आधारित प्रतिनिधि प्रजातंत्र में ऐसे मीडियाकर लोगों  का वर्चस्व हो जाता है जो औसत चालाकी, स्वार्थ-सिद्धि , आत्मा-छलावा और अहंकार के प्रतिमूर्ति होते हैं और जिनमे मानसिक अयोग्यता, नैतिक –शून्यता , भीरुता और दिखावा कूट-कूट कर भरी होती है. बारे से बारे मुद्दे इनके पास आते हैं पर ये उन्हें अपेक्षित गरिमा से नहीं बल्कि अपने छोटेपन से हीं निपटाते है.
कांग्रेस-नेत्रित्व वाली यू पी ए -२ ने कुछ बहुत हीं अच्छे जन-कल्याण के कार्यक्रम शुरू किये लेकिनचूँकि उनका क्रियान्वयन राज्य अभिकरणों के हाथ में था इसलिए वे सारे भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गए. इनमें मंरेगा, सर्व शिक्षा अभियान, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन और आने वाला खाद्य सुरक्षा कानून है. शायद विश्व के किसी अन्य विकसित या विकासशील देश में (ब्राज़ील, मैक्सिको सरीखे कुछ को छोड़ कर) इनते अच्छे कार्यक्रम नहीं हैं पर ना तो कांग्रेस का कैडर संरचना ऐसी थी कि वह राज्य सरकारों के भ्रष्टाचार से इसे ख़त्म ना होने दे ना हीं सरकार जनता के बीच अपेक्षित सामूहिक चेतना विकसित कर पाई.

भरष्टाचार के खिलाफ जन चेतना को यू पी ए सरकार ने “जो भ्रष्टाचार विरोधी खेमे में वह सरकार विरोधी” का भाव ले लिया लिहाज़ा सन्देश यह गया कि सरकार भ्रष्टाचार की पोषक है. उसी तरह बलात्कार कांड में भी पुलिस ऐसी लीपा-पोती करना चाहती थी जिससे यह लगा कि सरकार महिलाओं के बारे में संजीदा नहीं है.

राहुल के आने का अगर यह मतलब है कि अतार्किक रूप से भारतीय जनता पार्टी या संघ को आतंकवादी बताने वाले गुट जिसका नेतृत्व राहुल के चहेते दिग्विजय सिंह करते है हावी रहा तो कांग्रेस को हराने के लिए दिग्विजय-मणिशंकर-शिंदे की तिकड़ी काफी होगी. कांग्रेस को किसी भी दुश्मन की ज़रुरत नहीं होगी. ऐसा माना जा रहा है कि सोनिया के करीब लोगों का वर्चस्व घटेगा , अहमद पटेल कमज़ोर होंगे और अल्प-संख्यकों को लुभाने वाले या यूं कहें कि बहुसंख्यको को अनायास हीं एकत्रित करने वाले बयान और ज्यादा प्रमुखता से आयेंगे.

कम से कम राहुल के भाषण का एक सबसे बड़ा असर कैडर पर यह पड़ा है कि उसे अपना भविष्य काम करने में ना की चाटुकारिता करने में नज़र आ रहा है. लेकिन देखना होगा कि राहुल ने यह भाषण दिल से पढ़ा है या दिग्विजय-मणि-पित्रोदा टाइप जन-धरातल से दूर रहे नेताओं का तोता-रटंत भर है.

बहरहाल भाषण पर अगर अमल हो तो कांग्रेस भ्रष्टाचार से गिरी प्रतिष्ठा को एक बार फिर हासिल कर सकता है अपने जन कल्याणकारी कार्यक्रमों के ज़रिये खासकर प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून किससेदेश के ६७ फ़ीसदी लोगों को पांच किलो अनाज (तीन रु किलो चावल और दो रु गेहूं) मिलेगा.
   
 ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार देश का २२ मिलियन टन गेहूं गोदाम के आभाव (और ४० प्रतिशत फल व सब्जी रखाव, शीत-यातायात के ना होने से)  में बर्बाद हो जाता है जबकि इस स्कीम के लिए मात्र ६० मिलियन टन अनाज की ज़रुरत है. क्या अब भी समझाने की ज़रुरत है कि सत्ता में बैठे लोग मीडियाकर हैं. शायद राहुल गाँधी की यही चिंता भाषण में झलक रही थी.

bhaskar 

Monday, 14 January 2013

'समाचार प्लस' नेटवर्क का विस्तार, राजस्थान चैनल जल्द होगा लॉन्च

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में लोकप्रियता के शिखर पर स्थापित होने के बाद, अब 'समाचार प्लस' चैनल का विस्तार होने जा रहा है। इस नेटवर्क का दूसरा चैनल 'समाचार प्लस-राजस्थान' लॉन्च होने की दहलीज़ पर है। इसके लिए सभी तैयारियां लगभग पूरी की जा चुकी हैं। लुक एंड फील रेडी हो चुका है, न्यूज़रूम, स्टूडियो, पीसीआर-एमसीआर तैयार है और मशीनों का इंस्टालेशन चल रहा है।


मातृ संस्थान 'बेस्ट न्यूज़ कंपनी प्राइवेट लिमिटेड' के स्वामित्व वाले समाचार प्लस न्यूज़ नेटवर्क का ये दूसरा चैनल होगा। पहला चैनल उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड के लिए 15 जून 2012 को लॉन्च हुआ था, जो खासा पसंद किया जा रहा है। इस चैनल की कई ख़बरों का बड़ा असर भी हुआ है। एक्जीक्यूटिव एडिटर अतुल अग्रवाल के द्वारा एंकर किया जाने वाला, रात 8 से 9 बजे के बीच प्रसारित होने वाला प्राइम टाइम डिबेट शो 'बिग बुलेटिन' इसका फ्लैग-शिप शो है। इसमें जनता के प्रवक्ता की भूमिका निभाने वाले अमिताभ अग्निहोत्री की तीखी टिप्पणियों को भारी जन-समर्थन हासिल है और राजनीतिक गलियारों में खासी धमक भी है।


वैसे भी प्राइम टाइम न्यूज़ एंकर अतुल अग्रवाल के तीखे तेवरों को राजस्थान के लोग अच्छी तरह से पहचानते हैं क्योंकि वो 'वॉयस ऑफ इंडिया' के राजस्थान चैनल के हैड रह चुके हैं और तब वो चैनल लगातार नंबर वन बना हुआ था। अब उम्मीद की जा रही है कि राजस्थान के दर्शकों के लिए आ रहा ये चैनल 'समाचार प्लस-राजस्थान' भी दर्शकों को काफी पसंद आएगा। इसके लिए आवेदन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इच्छुक एवं योग्य कैंडीडेट्स samacharplusrajasthan@gmail.com (समाचार प्लस राजस्थान@जीमेल.कॉम) पर अपना CV और फोटोग्राफ ई-मेल कर सकते हैं।

Sunday, 13 January 2013

रिलायंस ब्रॉडकास्ट ने लॉन्च किया भोजपुरी चैनल


रिलायंस ब्राडकॉस्ट नेटवर्क (आरबीएनएल) ने अपनी क्षेत्रीय पहुंच में बढ़ोतरी करते हुए बिहार और झारखंड के लिए भोजपुरी चैनल बिक मैजिक शुरू करने की घोषणा की है। इसके पहले कंपनी ने हाल ही में उत्तर प्रदेश में जेवी चैनल बिग आरटीएल थ्रिल शुरू किया था, जिसमें ऐक्शन को प्रमुखता दी गई है। 21 जनवरी से शुरू हो रहा यह चैनल न केवल धनबाद, मुजफ्फरपुर, गया, भागलपुर, आरा, जमशेदपुर और रांची में उपलब्ध होगा, बल्कि बिहार और झारखंड के छोटे कस्बों में अपनी पहुंच रखेगा। 


चैनल की पहली झलक में भोजपुरी सुपरस्टार रवि किशन सामने आए। रवि किशन ने कहा, 'मैं बिग मैजिक बिहार व झारखंड का हिस्सा बनकर बहुत उत्साहित महसूस कर रहा हूं। भोजपुरी फिल्मों में काम करके मैं एक भोजपुरी चैनल की अहमियत समझता हूं। मुझे भरोसा है कि मेरे प्रशंसक मुझे पुलिस फाइल्स कार्यक्रम में देखकर खुश होंगे और क्षेत्र में यह अव्वल शो बनकर सामने आएगा।  

Friday, 11 January 2013

गंगा में स्नान तो दूर आचमन तक मुश्किल



गंगा

कन्नौज के नजदीक गंगा नदी का नानामऊ घाट

शाम करीब पांच बजे का समय है. ढलते सूरज की परछाईं गंगा नदी में पड़ रही है. नदी के दूसरे छोर पर कुछ चिताएं जल रही हैं.

मै गंगा नदी के नानामऊ घाट पुल के ऊपर खड़ा हूँ. यह जगह कानपुर से गंगा नदी की ऊपरी धारा में करीब 80 किलोमीटर दूर है. इत्र नगरी कन्नौज यहाँ से करीब 20 किलोमीटर है.

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने कुछ दिनों पहले ही यहीं पुल के ऊपर एक मशीन लगाई है. इस मशीन से एक पाइप नीचे नदी में गई है.

यह मशीन नदी की सेहत की जानकारी ठीक उसी तरह देगी, जैसे अस्पताल में आईसीयू की मशीनें किसी रोगी की सेहत की जानकारी देती हैं.

लेकिन मेरे लिए तो मछुआरे ही नदी के इंजीनियर और डॉक्टर हैं. इसलिए मै पुल से उतरकर नीचे घाट की तरफ जाता हूँ.

मछुआरों की एक टोली मछली पकड़ने का जाल बना रही है. तभी एक मछुआरा अपनी छोटी सी नाव घाट के किनारे लगाता है और अपने जाल से एक- एक करके मछलियाँ निकालता है.

बढ़ता प्रदूषण घटती मछलियां

गंगा

किसी ज़माने में यहाँ ट्रक भर-भरकर मछलियाँ निकलती थीं.

मछुआरों का कहना है कि ऊपर से मिलों का गंदा पानी आने से मछलियाँ बहुत कम रह गई हैं.

नदी में मछलियाँ न बचने का मतलब है कि नदी गंभीर रूप से प्रदूषित है.

दरअसल यहीं से कुछ किलोमीटर ऊपर कन्नौज के पास राम गंगा और काली नदियाँ, उत्तराखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कागज़ कारखानों, चीनी मिलों, शराब कारखानों, रासायनिक उद्योगों और मेरठ, मुजफ्फरनगर, मुरादाबाद, बरेली जैसे शहरों का गंदा पानी गंगा में मिलता हैं.

चमड़ा उद्योग और प्रदूषण

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी मानते हैं कि सरकार की तमाम सख्ती के बावजूद ये उद्योग चोरी-छिपे अपनी गंदगी नदियों में डाल देते हैं.

बुलंदशहर के नरोरा बैराज से ऊपर हरिद्वार में गंगा में 14-15 हजार क्यूसेक तक पानी आता है.

लेकिन इसका अधिकांश भाग नहरों के जरिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सिंचाई और दिल्ली की पेयजल आपूर्ति के लिए भेज दिया जाता है.

कुछ समय पहले तक नरोरा से आगे गंगा में केवल 350 क्यूसेक पानी छोड़ा जाता था.

इसलिए राम गंगा और काली नदियों की गंदगी मिलने से कन्नौज के नीचे गंगा का पानी एकदम काला दिखता था. यहां के पानी में बहुत अधिक मात्रा में बैक्टीरिया कोलीफार्म रहता है, जिससे पानी न पीने लायक होता है और न नहाने लायक.

गंगा में घातक बैक्टीरिया

गंगा

अब कुंभ के चलते कई दिनों से नरोरा से करीब 2500 क्यूसेक पानी गंगा में डाला जा रहा है. मछुआरों का कहना है कि पानी बढ़ने से अब नदी पहले से कुछ साफ़ है. लेकिन हल्का पीलापन और भूरापन बरकरार है.

मेरे सफर का अगला पड़ाव कानपुर शहर की ऊपरी सीमा पर बना गंगा बैराज है. यहां शहर की पेयजल आपूर्ति के लिए पानी निकाला जाता है, इसलिए गंगा को रोककर रखा जाता है ताकि जलस्तर समुद्र तल से लगभग 111 मीटर ऊपर बना रहे.

कानपुर जल संस्थान के हवाले से ख़बरों में कहा गया है कि यहाँ पानी में कोलीफोर्म बैक्टीरिया का स्तर घातक है. इसके अलावा कुछ जहरीले रसायन भी हैं.

यानी उत्तराखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से गंगा में इतना ज्यादा प्रदूषण डाला जाता है कि अपनी अनोखी स्वयं-शुद्धि क्षमता के बावजूद कन्नौज से लगभग 80 किलोमीटर के सफर में भी गंगा अपने को उससे मुक्त नहीं कर पाती.

बैराज से निकलते हलके भूरे पानी में उठते झाग इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है.

सवाल आस्था का

गंगा

पंडित सम्पूर्णानंद मिश्रा पन्द्रह सालों से गंगा की शरण में हैं

बैराज घाट पर दो-चार लोग स्नान-ध्यान करते मिले. संपूर्णानंद मिश्र इनमें से एक हैं, जो 15 सालों से गंगा जी की शरण में हैं.

वे कहते हैं, ''गंगा जी में आस्था तो संपूर्ण है. आस्था के नाम पर तो हम गंगा जी की शरण में हैं. जीवन-मौत का फैसला देने वाली वही माँ हैं. वही अंत में तारती हैं.''

करीब 30 लाख की आबादी वाले औद्योगिक शहर कानपुर से रोजाना लगभग 70 करोड़ लीटर सीवेज गंगा में जाता है. इस सीवेज में कई उद्योगों का खतरनाक केमिकल शामिल है.

इन उद्योगों में सबसे खतरनाक है जाजमऊ का चमड़ा उद्योग. शहर के 400 से अधिक चमड़ा कारखानों से करीब पाँच करोड़ लीटर प्रदूषित पानी निकलता है.

कानूनन चमड़ा कारखानों की जिम्मेदारी है कि वे अपने कैम्पस में प्राथमिक उपचार करके कचरा छान लें. लेकिन वास्तव में ऐसा नही हो रहा है.

ट्रीटमेंट प्लांट की हकीकत

कई ट्रीटमेंट प्लांट गंदे पानी को साफ करने में सक्षम नहीं हैं

हकीकत जानने के लिए मै जल निगम की ओर से संचालित ट्रीटमेंट प्लांट देखने अंदर गया.

वहां चमड़ा कारखानों से आने वाले गंदे पानी के साथ आ रही चमड़े की कतरन इस बात की गवाही दे रही थी कि चमड़ा कारखानों के प्राइमरी ट्रीटमेंट प्लांट ठीक से काम नही कर रहे हैं.

आईआईटी कानपुर की एक जांच में बताया गया है कि चमड़ा कारखानों के इस गंदे पानी में क्रोमियम की मात्रा लगभग 124 मिलीग्राम प्रति लीटर है, जो निर्धारित मात्रा से 62 गुना अधिक है.

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि अब से करीब 17 साल पहले बने इस ट्रीटमेंट प्लांट की तकनीक भी क्रोमियम को साफ़ करने में सक्षम नही है.

यहां पर करीब 16 करोड़ लीटर शहरी सीवेज के ट्रीटमेंट की भी व्यवस्था है. चिंता की बात यह है कि इस सीवेज में भी क्रोमियम की मात्रा करीब 17 मिलीग्राम प्रति लीटर, यानी खतरनाक स्तर तक पाई गई.

इस ट्रीटमेंट प्लांट में चमड़ा कारखानों का औसतन एक करोड़ लीटर दूषित जल लेने की क्षमता है. यानी बाक़ी करीब चार करोड़ लीटर पानी सीधे गंगा में जाता है.

चमड़ा कारखानों की करतूत

अधिकारियों का कहना है कि कई चमड़ा कारखानों के मालिक अपना जहरीला कचरा शहर की सीवर लाइन में डाल देते हैं.

आईआईटी कानपुर में पर्यावरण इंजीनियर प्रो. विनोद तारे पिछले कई सालों से गंगा में प्रदूषण की जांच-पड़ताल कर रहे हैं. उनका कहना है कि यह ट्रीटमेंट प्लांट बेकार हो चुका है. उसके संचालन और रखरखाव की भी समस्या है.

"क्रोमियम तो मिलना ही मिलना है. कई जगह प्राथमिक उपचार होते ही नही हैं और कई जगह होते भी हैं तो ठीक से नहीं. फिर उसमें क्रोमियम तो आएगा ही. वह प्लांट इसके लिए डिजाइन भी नहीं किया गया है"

प्रोफेसर विनोद तारे, पर्यावरण इंजीनियर

प्रो. तारे का कहना है, ''क्रोमियम तो मिलना ही मिलना है. कई जगह प्राथमिक उपचार होते ही नही हैं और कई जगह होते भी हैं तो ठीक से नहीं. फिर उसमें क्रोमियम तो आएगा ही. वह प्लांट इसके लिए डिजाइन भी नहीं किया गया है.''

एक और खतरनाक बात यह है कि जल निगम के इस ट्रीटमेंट प्लांट से क्रोमियम युक्त जहरीला गंदा पानी एक नहर के जरिए आसपास के गांवों को सिंचाई के लिए दिया जाता है जिससे इलाके के लोग बीमार हैं. यह नहर भी अंत में गंगा में मिलती है.

जल निगम ने कई एकड़ में फैले अपने कैम्पस में बड़े-बड़े कच्चे तालाब बना रखे हैं. इनमें भरा दूषित पानी आसपास के गाँवों के भूमिगत जल को प्रदूषित कर रहा है.

आसपास रहने वाले कई लोगों ने बताया कि अक्सर जब ट्रीटमेंट प्लांट में खराबी होती है तो जहरीला सीवेज नाले के जरिए सीधे गंगा नदी में डाल दिया जाता है.

जाजमऊ में वाजिद नगर इलाके में मैंने एक खुला नाला सीधे गंगा में जाते देखा. गंगा की सफाई से जुड़ी संस्था 'ईको-फ्रेंड्स' के सचिव राकेश जायसवाल ने पानी के नीले रंग पर ध्यान दिलाते हुए बताया कि चमड़ा कारखानों की गंदगी सीधे गंगा में जा रही है.

वे कहते हैं, ''इसमें चमड़ा कारखानों का पानी है. आप देख सकते हैं ये नीले और भूरे रंग का पानी है. इस समय थोड़ी न्यायालय की भी सख्ती है, सरकार भी दिखाती है कि कुछ सख्ती की जा रही है, इसलिए दिन में काम बाईपास करते हैं, रात में ज्यादा करते हैं.''

नाले के किनारे खड़े लोगों ने बताया कि चमड़ा फैक्ट्रियां रात के अंधेरे में बड़ी मात्रा में अपनी जहरीली गंदगी नाले के जरिए सीधे गंगा में डालती हैं.

लोगों ने बताया कि वाजिदपुर के अलावा शीतला बाजार, बुढ़िया घाट और दबका घाट नालों से भी चमडा कारखानों की गंदगी चोरी-छिपे सीधे गंगा में जाती है.

गंगा प्रदूषण के मामले में कई जनहित याचिकाएं हाई कोर्ट में चल रही हैं. सुनवाई के दौरान एक बार अदालत ने सुझाव दिया था कि चमड़ा कारखानों को कानपुर से हटाकर कहीं अन्यत्र स्थापित कर दिया जाए.

बात साधु समाज की

स्वामी अरुण पुरी

स्वामी अरुण पुरी कहते हैं कि संतों को भी गंगा की सुध लेनी चाहिए

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सचिव जेएस यादव कहते हैं कि अगर ऐसा हो सके तो वही स्थायी समाधान होगा.

वे कहते हैं, ''अगर चमड़ा कारखानों को यहां से शिफ्ट करके गंगा से कहीं दूर स्थापित किया जाए और वहां उनको समस्त सुविधाएं जैसे साझा ट्रीटमेंट प्लांट बनाए जाएं तो यह बहुत ही उत्तम होगा. जब तक ये चमड़ा कारखाने जाजमऊ में है, गंगा में जहर घुलता ही रहेगा.''

इस सबका परिणाम है कि गंगा में श्रद्धा के बावजूद बहुत से लोग यहां पानी पीना या आचमन करना तो दूर नहाना भी पसंद नहीं करते.

कानपुर का मशहूर सिद्धनाथ मंदिर घाट इन दिनों सूना है. एक-दो जो लोग घाट पर मिले भी, उनका कहना है कि अब वे यहां नहाते नहीं, केवल गंगा जी के दर्शन के लिए आते हैं. गंगे तव दर्शनात मुक्ति.

"दुराचार हम लोग गंगा के साथ कर रहे हैं. यह अमानवीय कृत्य है. इसको किसी भी तरह से बर्दाश्त नही किया जा सकता. "

स्वामी अरुण पुरी

जूना अखाड़े के महंथ अरुण पुरी यहीं पास के एक आश्रम में रहते हैं. अरुण पुरी गंगा की सफाई के लिए आंदोलन भी चलाते हैं. उनका कहना है कि देवी गंगा के साथ इस दुराचार के लिए राज और समाज दोनों जिम्मेदार हैं.

स्वामी अरुण पुरी कहते हैं, ''दुराचार हम लोग गंगा के साथ कर रहे हैं. यह अमानवीय कृत्य है. इसको किसी भी तरह से बर्दाश्त नही किया जा सकता. किसी भी स्तर से इसको उचित नही ठहराया जा सकता है. समस्त मानव समाज दोषी है इसके लिए. कहीं न कहीं साधु समुदाय भी दोषी है इसके लिए क्योंकि साधु समुदाय मठों में बैठकर प्रवचन करता है और इसके लिए अपने भक्तों को आंदोलित नही करता है.''

लेकिन गंगा जी की इस दुर्दशा के बावजूद भारतीय जनमानस के अवचेतन में सदियों से यह विश्वास भरा है कि हिमालय में गंगोत्री से जो अमृत जल आता है, वह उनके सारे पापों को धोकर उनके चित्त को निर्मल कर देगा और पुनर्जन्म के बंधन से मोक्ष भी देगा.

इसलिए देश-विदेश से करोड़ों लोग प्रदूषित पानी में भी गंगोत्री से आए एक बूंद अमृत जल की तलाश में गंगा में डुबकी लगाते रहते हैं.

'..तो अकेला जैसलमेर दे सकता है पूरे देश को बिजली

देशभर में बिजली की जबरदस्‍त कमी है. सरकारें मांग और पूर्ति की इस खाई को पाटने में नाकाम ही रही हैं. खासतौर पर गर्मी के दिनों में तो हाल और भी बुरे हो जाते हैं. कई इलाकों में तो 20-20 घंटे तक पावर कट रहता है. ऐसे में उम्‍मीद की एक किरण राजस्‍थान के जैसलमेर से आयी है.

केंद्रीय ऊर्जा मंत्री डा. जितेंद्र सिंह ने गुरुवार को कहा कि राजस्थान की भौगोलिक परिस्थतियां बेहद चुनौतीपूर्ण हैं और यहां पानी की भारी कमी है लेकिन प्रकृति ने इस राज्य को ऐसी सौगात दी है कि सभी संसाधन समाप्त होने पर अकेला जैसलमेर जिला पूरे देश को बिजली दे सकता है. उनके मुताबिक यहां सिर्फ सौर ऊर्जा के माध्यम से तीन लाख मेगावाट बिजली पैदा की जा सकती है. सिंह गुरुवार को यहां एक होटल में राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक की 30वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित समारोह को मुख्य अतिथि के रूप में सम्बोधित कर रहे थे. उन्होंने कहा कि राज्य सरकार गांवों एवं किसानों के विकास के लिए प्रतिबद्घ है और इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए कई कल्याणकारी योजनाएं शुरू की हैं.

उन्होंने कहा कि नाबार्ड ने भी गांवों एवं किसानों के विकास में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है. उन्होंने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी ने गांवों एवं किसानों के विकास के लिए आज से तीस वर्ष पहले नाबार्ड की शुरुआत की थी. तब इसका निवेश मात्र 4, 500 करोड़ रुपए था, जो अब बढ़कर एक लाख 85 हजार करोड़ रुपए हो गया है.

ऊर्जा मंत्री ने कहा कि नाबार्ड ने प्रदेश के विकास में बहुत बड़ा योगदान दिया है. सड़कों से लेकर पेयजल परियोजनाओं एवं अब ऊर्जा परियोजनाओं में भी ऋण देकर नाबार्ड ने प्रदेश के विकास में सहयोग किया है. उन्होंने कहा कि बेहतर प्रबंधन और सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का ही परिणाम है कि विषम भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद प्रदेश का विकास तेज गति से हो रहा है.

उन्होंने कहा कि प्रदेश में बिजली उत्पादन के लिए तैयार हो रहे बिजली संयंत्रों का लगभग 90 फीसदी कार्य पूरा हो चुका है और इनके पूरे होने पर वर्ष 2013 में प्रदेश बिजली के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो जाएगा और हम 5 हजार मेगावाट बिजली का अतिरिक्त उत्पादन करेंगे।

टूरिज्म: रेत पर अब सुरीली रात का समां

राजस्थान के रेगिस्तान की शाम तब और भी खूबसूरत लगती है जब यहां लगे तंबुओं में बैठकर लोकनृत्य का आनंद उठाने का मौका मिल जाए. और जब तंबू में फाइव स्टार सुविधाएं भी हों तो आनंद कई गुना बढ़ जाता है. इसीलिए तो जैसलमेर के थार रेगिस्तान से 20-25 किलोमीटर दूर सम गांव की तरफ ढेरों टेंट रिसॉर्ट विकसित हो चुके हैं. यहां लगभग एक हजार सर्व सुविधायुक्त टेंट लगे हैं.
विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए इन भव्य लक्जरी टेंटों में फाइव स्टार होटलों जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं. इनमें एसी लगे होते हैं, लाइव बारबेक्यू, गोल्फ कोर्स से लेकर स्विमिंग पूल जैसी लक्जरी भी मुहैया करवाई जा रही है. सैलानियों के लिए कैमल रेस (ऊंट दौड़), कैमल पोलो जैसे मनोरंजन के इंतजाम भी किए जा रहे हैं.
थार रेगिस्तान में बसी टेंटों की यह दुनिया वाकई अद्भुत है. सम के रेतीले धोरों की तरफ जाने वाले मार्ग पर दोनों ओर देखकर लगता है, जैसे यह टेंट रिसोर्ट का कोई छोटा-मोटा शहर हो. सारा इंतजाम देशी-विदेशी सैलानियों की पसंद को देखते हुए किया गया है. दरअसल रेगिस्तान में रात को रुकना पर्यटकों के लिए हमेशा रोमांच भरा रहा है. लेकिन सुविधाओं के अभाव में ज्यादा पर्यटक अपनी इस इच्छा को पूरा नहीं कर पाते थे.
इसलिए लगभग पांच साल पहले यहां आधुनिक सुविधाओं वाले टेट लगाने का चलन शुरू हुआ, जिसके चलते अब सालाना तीन लाख पर्यटक लक्जरी टेंटों का आनंद उठाने के लिए यहां आने लगे हैं. वे इन टेंटों में एक रात रुकने के लिए 3,000-10,000 रु. तक खर्च करने से गुरेज नहीं करते. टेंट का किराया उसमें मौजूद सुविधा के मुताबिक तय होता है.
सम के रेगिस्तान में सभी आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित डेजर्ट स्प्रिंग नाम का टेंट रिसोर्ट बना रहे पर्यटन कारोबारी मयंक भाटिया कहते हैं, ‘‘पर्यटक आधुनिक सुविधाओं से युक्त टेंट चाहते हैं. उनकी मांग को देखते हुए हम 25 टेंटों का एक ऐसा लक्जरी टेंट रिसोर्ट बना रहे हैं जिसमें बड़ा गोल्फ कोर्स, टेनिस कोर्ट और बैडमिंटन कोर्ट होगा. टेंट के भीतर स्टडी टेबल, वार्डरोब, इलेक्ट्रॉनिक सेफ, फ्रिज, सोफा, मिनी बार, लाइव बारबेक्यू सहित और भी ढेरों सुविधाएं होंगी.’’
रेगिस्तान में पानी की जबरदस्त कमी तो हमेशा से ही रही है लेकिन रेगिस्तान के मध्य में होते हुए भी इन टेंटों में ठंडे और गरम पानी की लगातार सप्लाई होती है. टेंटों का निर्माण करवाने वाले ज्यादातर होटल व्यवसायी हैं जो पर्यटकों की शाम को रूमानी बनाने के लिए तरह-तरह के और भी कई प्रयोग कर रहे हैं. वे रेत के टीलों पर कैंडल लाइट डिनर की व्यवस्था करते हैं. ठेठ राजस्थानी लोक संगीत से सैलानियों की शामों को सुरीला बनाया जाता है. इसलिए इन यादगार लम्हों का लुत्फ उठाने के लिए आने वालों की तादाद बढ़ती चली जा रही है.
सम के टेंट रिसोर्ट राजस्थान डेजर्ट सफारी कैंप के मालिक उपेंद्र सिंह राठौड़ कहते हैं, ‘‘जैसलमेर के रेगिस्तान में लक्जरी टेंट दुबई के रेतीले टीलों पर बने हुए लक्जरी टेंटों की तर्ज पर बनाए जा रहे हैं. रेतीले टीलों पर मशाल लाइट डिनर, कैंडल लाइट डिनर की पर्यटकों के बीच खासी मांग है.’’
राठौड़ शाम-ए-जैसलमेर नाम से एक लक्जरी टेंट रिसोर्ट का निर्माण करवा रहे हैं. इस रिसोर्ट्स में रेतीले टीलों के बीच स्विमिंग पूल भी बनाया जा रहा है. इसमें नए शादीशुदा जोड़ों के लिए एक्सक्लूसिव कैंडल लाइट डिनर की सुविधा भी होगी, जो उनकी शाम को यादगार बना देगी.
लक्जरी टेंट के नए चलन की वजह है यहां पर आने वाले ऐसे सैलानियों का इस तरह की सुविधाओं की नियमित मांग करना. रेगिस्तान में ये सैलानी कुछ अलग और रोमांचक करने की इच्छा रखते हैं. जन्मदिन, शादी की सालगिरह और हनीमून मनाने के लिए रेत की धरती पर आने वाले लोगों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है.
कई चर्चित हस्तियां भी गुपचुप तरीके से रेगिस्तानी शाम का लुत्फ उठाने के लिए थार आती हैं. भारत में अमेरिका के पूर्व राजदूत रॉबर्ट ब्लैकविल भी अभी हाल ही अपनी पत्नी का जन्मदिन मनाने यहां आए थे. यहां पर ठेठ ग्रामीण परिवेश के बीच उन्होंने केक कैटरिंग सेरेमनी आयोजित की थी और इसके साथ ही कैंडल लाइट डिनर भी किया था. उनके अलावा पॉप स्टार मीका, दिवंगत ‘‘ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह और दूसरी शख्सियतें भी खास मौकों पर जश्न मनाने के लिए यहां आ चुकी हैं.

टेंट कारोबारी टेंट पर्यटन को लोकप्रिय बनाने के लिए और भी कई तरह की योजनाओं पर काम कर रहे हैं. जैसा कि भाटिया बताते हैं, ‘‘यहां आने वाले सैलानी ढेर सारा फन और रोमांच चाहते हैं. इसलिए उनकी मांग को देखते हुए हम रेगिस्तान में चलने वाले डेजर्ट स्कूटर और दूसरे वाहन लाने की योजना पर भी काम कर रहे है. इसके अलावा डिनर ऑफ ड्यून्स (रेत के टीले पर बैठकर भोजन) के नाम से खास इंतजाम किए गए हैं, जिसके तहत अनगिनत लजीज व्यंजन उपलब्ध करवाए जाते हैं.’’

मेहमानों की सुख-सुविधा के लिए जितने भी इंतजाम किए जाते हैं उनमें हनीमून मनाने के लिए यहां आने वालों का खास ध्यान रखा जाता है. राठौड़ की सुनिए, ‘‘नव विवाहितों का हम पूरा ख्याल रखते हैं. खास उनके लिए रात के समय राजस्थानी लोक गीत-संगीत के अलावा ऑस्ट्रेलियन बैले डांस का भी आयोजन किया जाता है.’’

रोमांच को बढ़ाने के लिए उपेंद्र सिंह राठौड़ कुछ और भी प्रयोग कर रहे हैं. वे बताते हैं, ‘‘हम अपने टैंट रिसॉर्ट में एक स्पेशल मचान रेस्टोरेंट भी बना रहे हैं. सैलानी इस पर बैठकर सूर्यास्त के मनोहारी दृश्य का आनंद उठा सकेंगे. साथ में लजीज भोजन का लुत्फ भी ले सकेंगे.’’ यहां आने वाला बोर हो, इसकी संभावना कम होती है क्योंकि मनोरंजन के तमाम साधन मौजूद रहते हैं.

इनमें कैमल पोलो, कैमल रैस और कैमल सफारी तो है ही, इन सब से मन भर जाए तो कई सारे इंडोर गेम भी मौजूद हैं. रोमांच के बाद अगर थोड़ी शांति की जरूरत महसूस हो तो आप यहां की लाइब्रेरी में बैठकर पसंदीदा किताबें पढ़ सकते हैं.

पर्यटन व्यवसायी महासंघ के अध्यक्ष और रॉयल डेजर्ट सफारी कैंप के मालिक जितेंद्र सिंह राठौड़ कहते हैं, ‘‘पर्यटक रेगिस्तान के बीचोबीच रुकना चाहते हैं. इसीलिए संचालक अपने टेंटों में बेहतरीन आधुनिक सुख-सुविधाएं उपलब्ध करवाने की कोशिश में जुटे हुए हैं. सम और खुहड़ी के रेतीले धोरों पर पसरे 1,000 से ज्यादा टेंटों में कैमल सफारी के लिए 700 से ज्यादा ऊंटों को लगाया गया है.’’
अपने शानदार किलों और हवेलियों के लिए प्रसिद्घ राजस्थान मुमकिन है, जल्द ही दुनिया भर में अपने खूबसूरत और अनोखे टैंट रिसॉर्ट्स के लिए भी पहचाना जाने लगे.

कुछ ऐसे बनाएं उन खास लम्‍हों को और भी खास

अकसर पुरुष बिस्‍तर में जाते ही अपनी सेक्‍स लाइफ का आंनद लेना चाहते हैं, लेकिन क्‍या आप जानते हैं कि ज्‍यादातर कप्‍लस को ये आदत पसंद नहीं होती.


बिस्‍तर में हसीन पल बिताने के लिए सबसे जरूरी है साथी को उसके लिए तैयार करने की. इसके लिए साथी को बाहों में भरना एक अच्‍छा ऑप्‍शन हो सकता है. जब आपका मन करे साथी के साथ प्‍यार के लम्‍हे बिताने का तो उन्‍हें अपनी बाहों में भर लें. इस दौरान जब भी आपको ऐसा लगे कि वे आपकी तरफ आकर्षित हो रही हैं, उन्‍हें अपनी बाहों में इस प्रकार जकड़े कि वे आपके मन की बात बिना आपके कहे ही समझ जाएं, फिर देखिए आपकी रात कितनी हसीन हो जाती है.

इसके अलावा अपनी सेक्‍स लाइफ को इंटरेस्टिंग बनाने के लिए हमेशा कुछ न कुछ नया ट्राई करते रहना चाहिए, इससे प्‍यार के इन पलों का मजा ना केवल दोगुना हो जाता है बल्कि रिश्‍ते में ताजगी भी बनी रहती है. इस दौरान ये भी ध्‍यान रखें कि ये नया तरीका हमेशा आपके साथी का ही न हो, कभी-कभी आप भी कुछ नया करें. फिर देखिए वो आपके ऊपर कैसे फिदा होते है.

इसके लिए आईना एक बेहतर ऑप्‍शन साबित हो सकता है. अपने बेडरूम में फुल लेंथ का मिरर लगाए, मिरर के सामने प्यार के इन हसीन लम्‍हों को मजा लें, सच मानिए शीशे में साथी के साथ इन पलों का आप और अधिक लुत्फ उठा पाएंगे.

क्‍या कभी आपके साथ ऐसा हुआ है कि आपका मन खूबसूरत पलों में खोने का हो, लेकिन ऑफिस से थके-मांदे घर आए आपके साथी ऐसा बिलुकल नहीं करना चाहते हों. अगर हां, तो अब सवाल उठता है, उन्‍हें कैसे इन पलों में खोने के लिए राजी किया जाए.

इसके लिए अपने पार्टनर की आंखों पर पट्टी बाधें, फिर साथी के होठों पर प्‍यार भरा चुंबन दें. इस दौरान साथी के शरीर में होने वाली थरथराहट से आप पहचान जाऐंगी कि अब आपके साथी भी उत्तेजित हो रहे हैं, इसके बाद साथी के कान पर किस करें. आपके इस किस के बाद यकीनन आपके साथी भी इन पलों के समुंद्र में खोने के लिए पूरी तरह से तैयार होंगे.

Wednesday, 9 January 2013

शराब पीकर भी होश में रहने वाला संन्यासीः ओशो



जब मैं कहता हूं, झुकने में आनंद है तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या ऐसे लोगों के चरणों में भी झुका जाए, जो गलत हैं; या उन चरणों में झुका जाए जो सही हैं? जटिल सवाल है; क्योंकि तुम कैसे तय करोगे कि कौन-से चरण सही हैं और कौन-से गलत हैं? जो हजारों लोग कहीं झुक रहे हैं, वे सही मानकर ही झुक रहे हैं, नहीं तो वे भी न झुकते। तुम्हें गलत दिख रहा है, इसलिए झुकने में अड़चन मालूम हो रही है। तुम मेरे पास झुक गए हो; लेकिन हजारों लोग तुम्हें मिल जाएंगे, जो मुझे गलत मानते हैं और मेरे चरणों में नहीं झुक सकते हैं।

तो, क्या ऐसा कोई मापदंड है, जिस पर तराजू हो, तुल जाए और तय हो जाए कि कौन सही है; एक दफे तय हो जाए, सब वहीं झुक जाएं; या तय हो जाए कि कौन गलत है? यह तो असंभव है। यह तय हो नहीं सकता। इसके तय होने का कोई उपाय नहीं है। मनुष्य इतना रहस्यपूर्ण है कि कोई कसौटी उसे कस नहीं पाती; वह सोने की तरह उथला नहीं है कि कस लिया और पता चल गया।

फिर एक को जो व्यसन मालूम पड़ता है, दूसरे को व्यसन न मालूम पड़े। मैं एक अघोरपंथी संन्यासी को जानता हूं, जो शराब पीने में अतिकुशल हैं और जिनकी जिंदगी करीब-करीब प्रार्थना में नहीं, वेश्याओं के नृत्य देखने में गुजरी। लेकिन वह ब्रह्मचारी हैं, यह भी मैं जानता हूं और उन-जैसा ब्रह्मचारी मैंने देखा नहीं। वेश्याओं का नृत्य वह इसलिए देखते रहे हैं- वह उनकी साधना का हिस्सा है।

शराब वे पीते हैं और डटकर पीते हैं; लेकिन उनको कभी किसी ने बेहोश नहीं देखा। वह उनकी साधना का अंग है कि शराब प्रभावित न करे; ध्यान इतना गहन हो जाए कि शराब शरीर को भले डुबा दे, ध्यान को न डुबा पाए, ध्यान शराब के सागर के ऊपर भी पृथक् खड़ा रहे, अतिक्रमण करता रहे। ये पुराने तंत्र के प्रयोग हैं। साधारणः ऊपर से देखने में बड़ी कठिनाई होगी।

वे बनारस में रहते हैं। मैं एक मित्र के घर मेहमान था। मैंने उनसे कहा कि उनके पास मुझे ले चलो, या उन्हें खबर कर दो तो वे चले आएंगे। उन्होंने कहा-यह तो कृपा करें। उनको यहां तो हम न बुला सकेंगे। मुहल्ले-पड़ोस में...। हम गृहस्थ आदमी हैं; और उनका नाम आप जानते हैं, किस तरह बदनाम है! और इधर हमारे घर में आएंगे तो आपकी भी बदनामी होगी, हमारी भी बदनामी होगी। और हम तो सलाह देते हैं कि आप भी वहां न जाएं। फिर भी आपको जाना हो तो ड्राइवर आपको ले जाएगा, मैं साथ नहीं आ सकता।

मुझे तो जाना था, उनसे मिलना था, बहुत वर्ष हुए मिला नहीं था-तो गया। मगर उस दिन से जिनके घर में रुका था, उनसे मेरा संबंध टूट गया, क्योंकि मैं गलत हो गया! जब गलत आदमी के पास मैं गया और उनके चेताने पर गया तो सारा फर्क हो गया। लौटकर घर आया, उस घर में मेरा कोई सम्मान न रहा। कैसे तय करोगे? तय करने का क्या उपाय है? किसी को एक बात ठीक लगती है, किसी को ठीक नहीं लगती।

पुस्तकः बोले शेख फरीद
प्रवचन नं. 4 से संकलित
साभारः ओशो वर्ल्ड फाउंडेशन


परिचयओशो रजनीश का जन्म 11 दिसम्बर 1931 को मध्य प्रदेश में रायसेन जिला के अंतर्गत कुचवाड़ा ग्राम में हुआ। ओशो अपने पिता की ग्यारह संतान में सबसे बड़े थे। 1960 के दशक में वे 'आचार्य रजनीश' एवं 'ओशो भगवान श्री रजनीश' नाम से जाने गये। ओशो ने सम्पूर्ण विश्व के रहस्यवादियो, दार्शनिको और धार्मिक विचारधाराओं को नवीन अर्थ दिया। अपने क्रान्तिकारी विचारों से इन्होने लाखों अनुयायी और शिष्य बनाये। 19 जनवरी 1990 को ओशो परमात्मा में विलीन हो गये।  

21 जनवरी से बढ़ेगा रेल किराया: पवन बंसल


नई दिल्ली। रेल मंत्री पवन बंसल ने बुधवार को रेल किराया में बढ़ोतरी का ऐलान किया। उन्होंने कहा कि नया किराया 21 जनवरी से लागू होगा। विभिन्न क्लास के किराये में बढ़ोतरी इस प्रकार है:-
-स्लीपर क्लास-6 पैसे प्रति किमी
-एसी 3-3 पैसे प्रति किमी
-एसी सेकेंड क्लास-2 पैसे प्रति किमी
-एसी चेयरकार-10 पैसे प्रति किमी
उपरोक्त बढ़े हुए किराए 21 जनवरी से लागू होगा।

वेश्या संग सेक्स भी रेप: डॉ.वैदिक


लोग सोचते हैं कि महिलाएं ही बलात्कार का शिकार होती हैं मगर यह पूरी तरह सही नहीं है। पुरुषों को भी ऐसे अत्याचार झेलने पड़ते हैं। ऐसा प्रसिद्ध चिंतक डॉक्टर वेद प्रताप वैदिक ने सोमवार को इंदौर में एक कार्यक्रम में कहा।
जागरण डॉट कॉम के अभिषेक मेहरोत्रा से अपने इस बयान पर खास बातचीत करते हुए डॉ. वैदिक ने कहा कि संपन्न और प्रभुत्वशाली स्त्रियों के द्वारा जबरदस्ती करने के मामले भी इतिहास में अनेकों बार सामने आते रहे हैं। दरअसल, बलात्कार बलशाली द्वारा निर्बल पर की गई गंभीर हिंसा का मामला है। इससे निपटने के लिए पुरुष और महिलाओं को अलग-अलग नजरिए से देखने के बजाय हमें बलशाली द्वारा निर्बल पर किए जाने वाले अत्याचार समाप्त करने के ठोस उपाय करने होंगे।
उनका कहना है कि प्राचीन काल में राजा, महाराजाओं, सामंतों और धनपतियों के यहां घरेलू कामकाज करने वाले चाहे वे पुरुष हो या स्त्री उन्हें मजबूरन बलात्कार का शिकार होना पड़ता था, जब बलपूर्वक कोई शारीरिक संबंध थोपा जाता है तो उसे बलात्कार कहते हैं। इस तरह के बलात्कार के शिकार वे सभी निर्बल लोग होते हैं,जिन्हें अपने सबल और समर्थ स्वामियों और सहयोगियों या अपरिचितों का सामना करना पड़ता है। बलात्कार के पीछे यौन आनंद कम और हिंसा की भावना अधिक होती है। इसीलिए यह प्राय: स्त्रियों, दलितों, पिछड़ों गरीबों पर ज्यादा होता हे। वह तो सिर्फ अपनी आक्रामकता का शिकार ढूंढता है।
डॉक्टर वैदिक ने बताया कि सोमवार को उन्होंने इंदौर प्रेस क्लब में दिए गए अपने भाषण में यह भी कहा कि जिस लड़की के साथ दिल्ली में बलात्कार हुआ और उसकी हत्या हुई, उसकी बहादुरी को वह सलाम करते हैं। उन्होंने कहा कि उन्होंने ही सबसे पहले उस लड़की के नाम को ससम्मान उजागर करने की मांग करते हुए कहा था कि उसे रेप के विरुद्ध 'प्रतिरोध की देवी' या 'भारत वीरांगना' का पद दिया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि देश के हर देश-गांव में उस कन्या के नाम का स्मारक बनाना चाहिए और जब इन बलात्कारियों को सजा दी जाए तो इनके पुतले उन स्मारकों में दिखाए जाए ताकि हर संभावित रेपिस्ट के लिए वे स्मारक मौत की घंटी सिद्ध हो।
डॉ. वैदिक ने बलात्कार की घटनाओं को सबल और निर्बल से भी जोड़ा। उन्होंने कहा कि बली (शक्तिशाली) व्यक्ति ही बलात्कार करता है चाहे फिर वह पुरुष हो या महिला। उन्होंने जा कहा कि रेप मनुष्य की हिंसक प्रवृति को दर्शाता है, यह कोई इन्जॉयमेंट का साधन नहीं है। उन्होंने यहां तक कहा कि वेश्या के संग किया जाने वाला सेक्स भी बलात्कार ही होता है, क्योंकि इसमें वेश्या की सहमति नहीं मजबूरी होती है। वहां पैसे के बल का प्रयोग होता है।

दूरदर्शन को अभी लंबा सफर तय करना है : अनुराग बत्ता


अनुराग बत्रा, चेयरमैन एंड एडिटर-इन-चीफ, एक्सचेंज4मीडिया.कॉम
हाल ही में फिर से दूरदर्शन के दिन लौट आए, 1 नवंबर 2012 को चार महानगरों में केबल टेलीविजन के डिजिटलीकरण के बाद से जब लगभग 1 लाख सेट टॉप बॉक्स की कमी हो गई। दर्शकों के सामने दूसरा कोई ऑप्शन (विकल्प) नहीं था, तब दर्शक सिर्फ दूरदर्शन के दो चैनल दूरदर्शन नेशनल और डीडी न्यूज़ पर ही शाम में समाचार देखने लगे थे।
जिस किसी ने ‘दूरदर्शन – नेशनल चैनल ऑफ इंडिया’ लिखा है, को एक बार फिर से सोचने की जरूरत है। फिल्म से लेकर सभी के लिए जरूरी शिक्षा पर बहस, हर चीज यहां मौजूद है। कुछ समय पहले तक इस पर गुणवत्ता की कमी थी, जो धीरे-धीरे ही सही एक बार फिर से लौट रहा है, जो दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले शो से मालूम होता है। वास्तव में, दूरदर्शन ने एक लंबा सफर तय किया है। यह मनोरंजन और ज्ञान का एक मात्र ऐसा जगह है जहां कई सारे चैनलों के गुलदस्ता उपलब्ध हैं और समाचार से लेकर, विचार, एंटरटेनमेंट सूचना सभी कुछ प्राप्त होता है। आज इसकी पहुंच भारत के 92 प्रतिशत भागों में है और इसके दर्शकों की संख्या 2.5 करोड़ के लगभग है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि दूरदर्शन की पहुंच दूसरे अन्य चैनलों की अपेक्षा सबसे अधिक है।
दूरदर्शन पर, टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, यह ना सिर्फ एक टेलीविजन चैनल है, “सरकार भी प्रिंट और रेडियो के क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहती है। 2014 में लोकसभा के चुनावों को देखते हुए निश्चित तौर पर सरकार को अपना मीडिया होने से लाभ मिलेगा।”
समाचारपत्रों के अनुसार, पंजाब और गुजरात सरकार अपना टेलीविजन चैनल लाना चाहती है जबकि मानव संसाधन मंत्रालय अपने डीटीएच प्लेटफॉर्म पर शैक्षणिक चैनल लाना चाहता हैं और इसके लिए सभी ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से मदद मांगी है।
30 साल के उपर के सभी लोगों को दूरदर्शन या डीडी की लोकप्रियता के बारे में पुरानी यादें जुड़ी हुई है। हम में से अधिकांश को याद होगा कि दूरदर्शन सिनेमा, थिएटर, फेयर्स और मेला जहां वास्तव में दृश्य मनोरंजन उपस्थित थे, के अलावा यह एक मात्र संस्थान था।
उसके बाद, वीसीआर, फिर सीडी और कई चैनल आए जो मनोरंजन पर अपना ध्यान ज्यादा फोकस कर रहे थे, ऐसे में डीडी से दर्शक दूर होते चले गए, क्योंकि इसके कार्यक्रम नई पीढ़ी को अपील नहीं कर पा रहे थे। इस तरह से यह धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा था। लंबे समय तक यह घाटे में रहा और फिर सरकार ने प्रसार भारती नाम से एक स्वायत्त संस्था का गठन करके सार्वजनिक क्षेत्र के प्रसारक संस्थान – दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो को इसके अंतर्गत ला दिया।
एक अनुमान के अनुसार, सार्वजनिक क्षेत्र का यह प्रसारण संस्था पांच वर्षों तक घाटे में रहा और अब खतरे की घंटी बजने लगी थी। अगस्त 2012 में राज्यसभा में सरकार ने एक प्रश्न के जवाब में कहा कि प्रसार भारती को 2009 से 4,224.55 करोड़ का घाटा हुआ है।
मंत्रियों के समूह जो प्रसार भारती के वित्तीय, कर्मचारी और प्रशासनिक विभागों को देखता है, ने सरकार से अपील की कि वे इसे गैर-योजना मद से वित्तीय सहायता दें जिससे कि 2011-12 से लेकर 2015-16 तक वेतन संबंधी खर्चे पूरा किया जा सके।
चाहे कुछ भी हो दूरदर्शन में बदलाव देखने को मिल रहा है। हालांकि, दूरदर्शन को सत्ता का समर्थक माना जाता है, इसका अधिकार सरकार के हाथों में है। उदाहरण के तौर पर हम देख सकते हैं कि लोकपाल बिल या अन्ना हजारे के समय डीडी न्यूज़ पर टीकर से काम चला लिया गया जबकि अन्य निजी चैनलों पर जोरदार तरीके से बहस आयोजित की गई। नेशनल न्यूज़ चैनल एकदम से बीबीसी की राह पर तो नहीं चल सकता है लेकिन कम से कम निष्पक्ष सूचना, टिप्पणी या विचार तो दे ही सकता है।
जैसा कि शिखा नेहरा ने अपने ब्लॉग, ‘दव्यूज़पेपर.नेट’ में लिखा, “24 घंटे सातों दिन चलने वाले समाचारपत्र अधिक से अधिक टीआरपी के चक्कर में एक-दूसरे से प्रतियोगिता करते हैं। डीडी न्यूज़ इन सभी प्रतियोगिता से अप्रभावित है। वर्षों से, जहां निजी चैनल दर्शकों को खुश करने के लिए हर संभव कदम उठाने का प्रयास करते हैं। डीडी न्यूज़ को इसकी कोई फिक्र नहीं होती है, कोई इसे देख भी रहा है कि नहीं।”
दूरदर्शन अन्य निजी चैनलों की अपेक्षा समाचारों के प्रजेंटेशन में उन्माद और सनसनीकरण से बचता है और अब न्यूज़ और बहस में पहले से बेहतर प्रस्तुति देखने को मिल रही है, जो समग्र तौर पर जीवंत बन दिख रहा है।
प्रसार भारती के सीईओ, जवाहर सरकार ने नवंबर में कहा था कि नेशनल ब्रॉडकास्टिंग नेटवर्क के सुधार के लिए 500 करोड़ का एर कार्यक्रम शुरू किया गया है। उन्होंने आगे कहा कि वर्तमान वैश्विक माहौल में अन्य चैनलों के साथ कड़ी टक्कर देने के लिए सरकारी मीडिया के संपूर्ण प्रक्रिया जिसमें ब्रॉडकास्टिंग और टेलीकास्टिंग न्यूज़ और अन्य कार्यक्रम शामिल है, का लोकतांत्रिकरण नहीं किया गया तब तक यह मुश्किल है।
लेकिन समस्या यह है कि भारत के 92 प्रतिशत घरों में अपनी पहुंच रखने के बाद भी दूरदर्शन प्रसारकों के द्वारा प्रतिवर्ष कमाए जाने वाले 15,000 करोड़ रुपये में से मात्र 10 प्रतिशत यानि 150 करोड़ रुपये ही प्राप्त कर पाता है। इसके अलावा, दूरदर्शन सिर्फ उन्हीं उत्पादों को तरजीह देता है जो ग्रामीण क्षेत्रों को अपना लक्ष्य करते हैं और इस तरह से मीडिया प्लानर्स और एडवरटाइजर्स के लिए कम स्कोप होता है।
बिजनेस स्टैंडर्ड की नज़रों में दूरदर्शन की मुख्य समस्या ‘अस्पष्ट’ और ‘विरोधाभाषी’ होना है। समाचारपत्र ने एक टेलीविजन चैनल के सीईओ का हवाला देते हुए लिखा है, “दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले सिनेमा और मनोरंजन जगत पर लगभग 70 प्रतिशत कार्यक्रम जिसे सीधे निजी चैनलों से प्रतियोगिता होती है, निजी चैनल इनसे बेहतर कार्यक्रम करते हैं। सार्वजनिक प्रसारक के सामने सबसे बड़ी समस्या है यह।”
पब्लिक ब्रॉडकास्टिंग नेटवर्क की दूसरी समस्या यह है कि इसके पास एडवरटाइजिंग बिल्कुल नहीं है।
इन सभी कमियों के बावजूद, डीडी के प्रेमी इस बात से सहमत हैं कि अन्य निजी चैनलों की अपेक्षा दूरदर्शन में अच्छाई भी है।
हाल के दिनों में इस पर कुछ अच्छे शो का प्रसारण भी किया गया जैसे कि ‘सत्यमेव जयते’। हालांकि, ‘स्टार टीवी’ के साथ इसे राजस्व का साझा करना पड़ा, लेकिन दूरदर्शन के लिए यह काफी अच्छा अवसर था। इसी तरह से ‘कोक स्टूडियो’ शो से दूरदर्शन को 14 करोड़ रुपये की आय प्राप्त हुई।
इन पहलुओं को देखते हुए दूरदर्शन को एक लंबा सफर तय करना है जिससे कि अधिक से अधिक दर्शक इससे जुड़ सके। मार्केट रिसर्च, शो की गुणवत्ता पर ध्यान देना होगा तथा साथ ही इसे शहरी भारत पर ध्यान देने के साथ ही क्रिएटिव और इनोवेटिव भी होना पड़ेगा।

बाजार और मनोरंजन के बीच ख़बर - वर्तिका नंदा


वर्तिका नंदा, वरिष्ठ मीडिया विश्लेषक
1977 में इमरजेंसी के दौरान भारतीय प्रेस सदमे की स्थिति में आ गया। खबरों में दिलचस्पी रखने वाले जानकार यह जानते हैं कि इमरजेंसी के खात्मे के बाद भारत में अखबारों के प्रचार-प्रसार में तेजी से इजाफा हुआ। खबरों के भूखे लोग अखबारों की तरफ लपके, वो सब जानने के लिए जिससे वे इस दौरान महरूम रहे थे। जाहिर है इस दौर ने अखबारों की सेहत एकाएक चमका दी।

लेकिन एक अखबार ऐसा भी था जिसके लिए इमरजेंसी फायदेमंद रही।  पंजाब के शहर जालंधर से छपने वाले पंजाब केसरी ने इमरजेंसी के दौरान सारे रिकार्ड तोड़ दिए। वो इकलौता ऐसा अखबार साबित हुआ जिसने इमरजेंसी की पहरेदारी के बीच भी अपना तिजोरी को भरने में कामयाबी पा ली। इमरजेंसी के दौरान पंजाब केसरी की सर्कुलेशन दोगुनी हो गई ( 60,000 से सीधे 1 लाख 20,000)। इसके लिए पंजाब केसरी ने जो फार्मूला अपनाया, वो आसान भी था, अनूठा भी।

 इमरजेंसी में एतराज था खबर के छपने से। तो इस दौरान पंजाब केसरी ने पहले पन्ने पर खबर नहीं छापी, लेकिन बाकी सब छापा। अखबार गोल-गप्पों की तरह स्वादिष्ट बना दी गई, पहले पन्ने को मैगजीन का रूप दे दिया गया, उसे चटखारेदार बना दिया गया। नतीजतन उस ब्लैकआउट के बीच भी अखबार भरपूर बिका। पंजाब केसरी के संस्थापक लाला जगत नारायण के पोते और अखबार के दिल्ली संस्करण के संपादक अश्विनी कुमार इसकी वजह कुछ इस तरह से बयान करते हैं -

 ऐसा कई वजहों से हुआ। एक तो इमरजेंसी के दौरान मेरे दादा को गिरफ्तार किया गया था, साथ ही अखबार की बिजली भी काट दी गई थी। स्थानीय लोग जानते थे कि हम हर स्तर पर संघर्ष कर रहे हैं। इसलिए जब हमने अखबार के पहले पन्ने पर मैगजीन देनी शुरू कर दी तो पाठक को सीधे तौर पर यही संदेश गया – वे हमें खबर छापने नहीं दे रहे, इसलिए हम आपको मैगजीन दे रहे हैं।

 इस फार्मूले ने आने वाले कई सालों के लिए अखबारों का जैसे एजेंडा ही तय कर दिया। पचास के दशक में डी आर मानेनकर ने कहा ने पाया था कि हमारे यहां की पत्रकारिता अभी इतनी सक्षम नहीं हुई है कि चारों तरफ फैले पाठकों के इतने बड़े संसार को थाम सके। लेकिन अगले कुछ सालों में स्थिति तेजी से करवटें लेती गई। पुरानी गलतियों और घिसती जा रही परिपाटियों से सबक लिए जाने लगे। अब 57,000 से ज्यादा अखबारें और पत्रिकाएं छापने वाले इस देश में नव साक्षरों की वजह से अक्षरों की दुनिया के प्रति एक स्वाभाविक रूझान बन रहा है। दूसरे, भारत की 65 प्रतिशत आबादी की उम्र 35 साल से कम है। तीसरे, उदारवाद के चलते पाठक पूरी दुनिया को जानने के लिए अतिरिक्त उत्सुक हो चला है। यह दुनिया का इकलौता देश है जो इस समय इतना युवा है। हमारा मध्यम वर्ग अमरीका की कुल जनसंख्या के बराबर है। जनसंख्या के हिसाब से भारत में कई आस्ट्रेलिया भी हैं और कई नाइजीरिया भी।

इन सबने मिलकर 230 साल से ज्यादा पुराने प्रिंट मीडिया और 50 साल पुराने जन सेवा माध्यम और करीब 18 साल पहले पैदा हुए निजी टेलीविजन को अपनी सोच और कलेवर को बदलने के लिए जैसे मजबूर ही कर डाला है। अखबारें और टेलीविजन समेत सभी संचार माध्यम एक तरह से प्रोडक्ट बन गए हैं। सभी को अपने सामान को बाजार में बेचना है और इसलिए यहां एक ऐसी प्रयोगशाला बना दी गई है जो चौबीसों घंटे प्रयोग करती है। नए संस्करण लाने, नई तकनीक को अपनाने और फीडबैक के मुताबिक खुद को नए सांचे में ढालने में इसे कोई आपत्ति नहीं है।

सोचने की बात यह है कि युवा मीडिया से आखिर चाहता क्या है – सिर्फ खबर या कुछ और भी। दरअसल जब से पश्चिम की तरफ से खिड़कियां खुल गई हैं, भारतीय युवा की सोच का दायरा भी विस्तृत हो गया है। वह लंबी उड़ान भरना चाहता है और बोरियत से बाहर आने को आतुर है। सालों तक मीडिया में राजनीति हावी रही।  अकेली राजनीति न तो अब उसे लुभाती है और न ही बहुत सम्मानित भी लगती है। वह प्रयोगधर्मी होना चाहता है और ऐसा मीडिया चाहता है जो उसके युवापने में बोरियत के बजाय रंग भरे, उसे नए विकल्प सुझाए और उसका साथी बने। इसलिए अब मीडिया को अपना मैन्यू बदलना पड़ा है। उसे कोने-कोने में बनने वाले नए पकवान और स्वाद इनमें शामिल करना पड़ रहा है और यह भी कोशिश करनी पड़ रही है कि इन प्रयोगों का खर्च कहीं और से आए।

यही वजह है कि भारत में न्यूज और मनोरंजन उद्योग इस समय अपने उफान पर है। 2006 में यह उद्योग 43,700 करोड़ के मुहाने पर खड़ा था और इस साल के मध्य तक इसके फैलाव में 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी के आसार दिखाई दे रहे हैं। मनोरंजन अब न्यूज मीडिया मे रचता-बसता जा रहा है। अखबार या न्यूज चैनल को देखते हुए कई बार उसमें से खबर को ढूंढना तक मुश्किल हो जाता है। बालीवुडाईजेशन और मैगजीनीफिकेशन ने मीडिया को एक नए मंच पर लाकर खड़ा कर दिया है। अब कंटेट इज दी किंग नहीं है। किंग विज्ञापन से आने वाला पैसा है और किंग मेकर युवा।  

जरा खबरों की दुनिया पर गौर कीजिए। टाइम्स ऑफ इंडिया ने 14 मार्च, 2010 को रविवारीय अखबार के साथ फ्लेमैंट नाम का एक मैगजीन निकाला। हिंदुस्तान टाइम्स की तुलना में लंबे और चौड़े इस अंक की कवर थीम थी – सेलिब्रेटिंग इंटरनेशनल फैशन। पूरी तरह से विज्ञापित इस मैगजीन में रंग और पेड लेख भरे हुए थे। इसे देखकर मशहूर पत्रकार और मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित पी.साईंनाथ की उस टिप्पणी का याद आना वाजिब था जिसमें उन्होंने कहा था कि इस देश में डिजाइनर कपड़े पहनने वाले लोग 0.5 प्रतिशत हैं लेकिन तब भी जब कोई फैशन वीक होता है तो उसे कवर करने पत्रकारों की फौज जाती है जबकि किसान की आत्महत्या को कवर करने के लिए पत्रकारों की गुहार लगाने पर भी पत्रकार नहीं मिलते।    

अब हिंदुस्तान टाइम्स के ब्रंच को ही लीजिए। 1924 को महात्मा गांधी ने जब हिंदुस्तान टाइम्स का लोकार्पण किया था तो बाकी अखबारों की तरह इस अखबार ने भी मिशन और जन हित की ही बात की थी। आज अखबार रोजाना रंगीन सप्लीमेंट छापता है जिसमें फैशन, मनोरंजन, फिल्म, संगीत, खाना, मेकअप,सेक्स, क्रिकेट – वह सब कुछ है जिसमें युवा की दिलचस्पी होती है। इस सप्लीमेंट के आधे से ज्यादा हिस्से पर सीधे तौर पर विज्ञापनों का राज दिखता है। दिल्ली के ये दोनों ही बड़े अखबार अब ऐसे कार्यक्रम आयोजित करने की भी होड़ लगाने लगे हैं जो कि पाठक को खींच सकें। अखबार में सेलिब्रिटीज की फोटो छापी जाती हैं और उन्हें वेबसाइट पर देखने का पता भी दिया जाता है। खबर भले ही छोटी करनी पड़े या छोड़नी पड़े लेकिन बाजार में आ रहे नए प्रोडक्ट्स के कसीदे गाने और सेलिब्रिटीज के नाज-नखरों की खबर छापने में कोई कोताही नहीं बरती जाती। नई कारों के आने से पहले उसके पेड लेख जोर-शोर से छप जाते हैं। कौन-सी क्रीम कितनी चमका सकती है और सिर पर नए बाल कैसे चिपकाए जा सकते हैं – इस पर मैगी नूडल्स स्टाइल में तुरत-फुरत लुभावने लेख छपते रहते हैं।

इसी तरह दैनिक हिंदुस्तान, प्रभात खबर, नई दुनिया, भास्कर –सभी ने अपने-अपने तरीके से अखबारों को मनोरंजनमय बनाया है। ईनाडू, आनंद बाजार पत्रिका और सकाल – तमाम अन्य भाषाओं के अखबार अपने स्वाद को बदलने में जुट गए। तमाम अखबारों ने लोकल बाजार को समझने की कोशिश की और अखबार को एक ग्लोकल चेहरा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वह मॉडर्न दिखना चाहता है, थोड़ा पारंपरिक भी रहना चाहता है और पूरी तरह से स्वीकार्य होना चाहता है। इसमें एक भली बात यह भी हुई है कि नीति-निर्धारकों से लेकर पेज थ्री के राजकुमार-राजकुमारियां अब क्षेत्रीय अखबारों और चैनलों की भूमिका को बखूबी समझने लगे हैं। गजिनी के बाद थ्री ईडियट्स के प्रचार के लिए आमिर खान जब दक्षिणी राज्यों में जाकर प्रचार करने लगते हैं तो शाहरूख खान भी अपने बंगले मन्नत में क्षेत्रीय मीडिया को बुलाकर माई नेम इज खान के लिए एक्सक्लूजिव इंटरव्यू देने लगते हैं। इन सबके बीच नए फिल्मकारों की पीपली लाइव भी अच्छी बाजी मार ले जाती है क्योंकि उसे अपनी पहली पारी में ही समाज की नब्ज समझ में आ जाती है। वह किसी स्टार को फिल्म से जोड़ता नहीं और एक गांव का नत्था ही उसे सफलता का ऐसा सेहरा पहना जाता है कि बाकी की उदासी देखते ही बनती है। 



एक सच यह भी है कि अखबार को चलाने का 90 प्रतिशत खर्चा विज्ञापन के मोहल्ले  से ही आता है। इसलिए विज्ञापन सर्वेसर्वा है। 1997 में जब प्रिंट मीडिया को मिलने वाला विज्ञापन 1985 की तुलना में 15 प्रतिशत घट गया तो अखबारों ने जाना कि विज्ञापन पाने के लिए वही करना होगा जो युवा चाहेगा। यही वजह है कि अगर किसी दिन किसी अखबार के रंगीन पेज में छपा दिन या महीना बदल भी दें या न दें तो शायद कोई बड़ा फर्क नहीं पड़ेगा। ग्लोकलाजेशन, बालीवुडाइजेशन, कारपोरेटाइजेशन – इस सबने अखबारों के कंटेट में से न्यूज को काफी हद तक निचोड़ दिया है। वैसे भी टीवी, और बाद में कलर टीवी, के आने से अखबार को अपना कलेवर बदलने के लिए काफी हद तक बाध्य होना पड़ा। वो भागती तस्वीरों से मुकाबला नहीं कर सकता था, लेकिन कोई रास्ता तो ईजाद करना ही था। इसलिए भी अखबारें अपने फार्मूले बदलने को बेचैन होती दिखने लगीं। रंगीन तस्वीरों और रंगीन पन्नों ने कागजी खबरों की दुनिया में ताजी हवा भरी। साथ ही अखबारों ने समझा कि टीवी जैसे उछलते माध्यम को टक्कर देने के लिए मनोरंजन के लॉलीपॉप को शामिल करना भी कम जरूरी नहीं।



अखबारों के स्मार्टाइजेशन की होड़ से अखबारों की वेबसाइट भला कैसे पीछे छूटतीं। स्मार्ट होती अखबारों के साथ ही उनकी वेबसाइट भी चमकने लगीं। यहां जनसंवाद ज्यादा मुखर हुआ। फीडबैक की गुंजाइश कई गुना बढ़ गई और लोग खुलकर अपनी बात एक पत्रकार की तरह बताने की कोशिशें करने लगे। सिटिजन जर्नलिज्म ने एक आम जन के हाथों में ताकत के विटामिन भर दिए। यही वजह है कि एक दशक के भीतर ही अखबारों के वेबसाइट भी चटपटे हो चले हैं। यहां विशुद्ध खबर को रोचक बनाने पर जोर है। साथ ही न्यूज के साथ व्यूज, क्रिकेट, सिनेमा, लाइफस्टाइल, फोटो, वीडियो, ब्लाग, शादी – इन सभी को साइटों की सांस बना दिया गया है। यहां रंगों की भरमार है। वीडियो फुटेज हैं और जनसर्वे का हिस्सा बनने का मौका। वेबसाइट चलते-फिरते टीवी हो चले हैं।



टीवी का मनोरंजन दूसरे तरह का रहा। 1959 से लेकर 90 की शुरूआत तक दूरदर्शन के नाम पर काफी हद तक सभ्य लेकिन सूखे मनोरंजन का ही राज रहा। साइट की अवधारणा किसानों और साक्षरता की बात के आस-पास ही घूमती रही। मनोरंजन के नाम पर हफ्ते में एक बार फिल्म मिलती थी और साथ में चित्रहार। बस, इसी में पेट भर लेना होता था। उदारवाद की लहर में जब निजी चैनलों का प्रसव हुआ तो टेलीविजन का व्याकरण जैसे बदल ही गया। यहां कभी नागिन के डांस ने सबको नचाया, कभी प्रलय ने डराया और कभी राखी सावंत या राहुल महाजन के स्वयंवर ने रिएलिटी के नाम पर हंसाया। पहली बार भारतीय टीवी पर ही ये प्रयोग हुआ कि न्यूज चैनलों के बीच में हंसगुल्ले यानी की हास्य परोसा जाने लगा। राजू श्रीवास्तव सरीखे एकाएक न्यूज चैनलों की आंखों के तारे बन चले। यहां तक कि फिल्म निर्माता और कलाकार भी जिस छोटे परदे को कभी पिछड़ी जाति जैसा माना करते थे, अब इसकी आरती उतारने लगे। फिल्मों के प्रमोशन के लिए बंटी और बबली के रिलीज होते ही रानी मुखर्जी और अभिषेक बच्चन एनडीटीवी की न्यूज तक पढ़ जाते हैं। आज टीवी को फिल्म से अलग नहीं माना जा सकता। दोनों एक-दूसरे में कब घुल गए, किसी को पता ही नहीं चला।



इसी तरह विवाद भी मनोरंजन की वजह बनने लगे। थ्री इडियट्स का असली लेखक कौन है, इस पर चेतन भगत और राजकुमार हीरानी की तूतू-मैंमैं गंभीरता से कहीं ज्यादा हंसी दिखती है। ऐश्वर्या राय के पेट में टीबी है, इसलिए वे मां नहीं बन पा रहीं, यह खबर एक चैनल पर आधे घंटे का कार्यक्रम बन जाती है ( बाद में आराध्या का जन्म और फिर उसकी एक झलक पाने की होड़ भी खबर बनती रही) कटरीना कैफ के जन्म दिन पर सलमान कब और कहां गए, करीना की शाहिद के साथ दाल नहीं गल रही, शाहरूख और फरहा के पति का झगड़ा होना – यह सब ब्रेकिंग न्यूज के दर्जे में डाला गया। मनोरंजन ऐसा कि जब एक अखबार का पत्रकार पी चिदंबरम पर जूता फेंकने की कोशिश करता है तो मीडिया उसमें भी चुस्कियां लेता दिखता है और जनता भी। वो जूता और वो पत्रकार उस दिन सेलिब्रिटी सरीखे बन जाते हैं। मीडिया ने गंभीरता में मनोरंजन का पुट ऐसा भर दिया है कि गंभीरता भी अब हंसी के लबादे में लिपटी दिखने लगी है और यहां तक कि आध्यात्म भी। एक सर्वेक्षण ने साबित किया कि आध्यात्मिक चैनलों को देखने वालों में युवाओं की तादाद लगातार बढ़ रही है। वे विज्ञापन देखकर अगर सोना बाथ के लिए जाते हैं तो रूद्राक्ष और मोती भी खरीदते हैं। उधर योग गुरू भी अब रोचक होने लगे हैं। वे कपाल भाति करने की विधि हिंग्लिश में समझाते हैं और चुस्त दिखते हैं। अब वे राजनीति की गुगली खेलने लगे हैं।

कई बार लगता यही है कि ऐसे मनोरंजन के कई प्रयोग शायद युवा को पसंद भी आए हैं। शायद इसी का नतीजा है कि फिक्की और केपीएमजी ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा कि 2009 से 2013 के बीच भारतीय टेलीविजन उद्योग में 14.5 प्रतिशत तक का उछाल आना निश्चित है। 2013 तक अकेला टीवी कुल विज्ञापन उद्योग का 41 प्रतिशत अपनी झोली में डालने में समर्थ हो जाएगा।

बेशक खबर अब ठिठोली करने लगी है। बरसों पहले टी एस ईलियट ने जब कहा था कि टीवी का काम मूलत मनोरंजन परोसना ही होना चाहिए तो किसी को शायद तब यह बात समझ में नहीं आई थी, लेकिन अब ऐसा नहीं हैं। मीडिया ने अब इंडिया और भारत – ये दो वर्ग बड़ी सफाई से गढ़ दिए हैं। यहां मनोरंजन के नाम पर अब सपने बेचे जाने लगे हैं या फिर त्रासदी। पहले पन्ने से लेकर आखिरी पन्ने तक, टीवी पर दिखने वाले पहले चैनल से लेकर आखिरी चैनल तक और वेब पन्नों पर भी कोशिश युवा को रिझा लेने की है लेकिन यहां इस सच से आंखें नहीं मूंदने चाहिए कि जैसा राजनीति युवा नाम के वोट बैंक को रिझाने में मस्त रही, कहीं उसी तरह मीडिया भी युवा को किसी बहाने की तरह इस्तेमाल करने का आदी बनने तो नहीं लगा। पूंजी के महल युवा को सोने के सिक्कों की तरह तो देखते हैं जिन्हें तिजारी में भरे रखने के फायदे हैं लेकिन इससे युवाओं को मिलेगा क्या।। बाजार जब तालियां हासिल करता है तो उपलब्धि के सर्टिफिकेट अपने नाम लिखवा लेता है लकिन जब कुछ पटरी से उतरता है तो दोष सीधे युवाओं के सर पर।। कब तक चलेगी यह खो-खो।

संदर्भ ग्रंथ

1. इंडियाज न्यूजपेपर रिवॉल्यूशन, रॉबिन जेफ्री, ऑक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी प्रेस, 2003

2. एवरीबडी लव्स ए गुड ड्राउट – पी साईंनाथ, पेंग्विन बुक्स इंडिया, 2000

3. टेलीविजन और क्राइम रिपोर्टिंग, वर्तिका नन्दा, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2010

लेखिका के ब्लॉग से साभार