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Saturday, 13 October 2012

फिर न कहना हमने चेतावनी नहीं दी थी !


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 रजत शर्मा, एडिटर-इन-चीफ, इंडिया टीवी
राज ठाकरे ठीक कह रहे हैं कि ये न्यूज चैनल वाले बिना सोचे-समझे खबरें दिखाते हैं। राज ने सिर्फ इतना कहा था कि वह बिहारियों को महाराष्ट्र से बाहर फिंकवा देंगे। इसको अभी से खबर बनाने की क्या जरूरत थी? वह जब दो-चार लोगों को फिंकवा देते, पिटाई करवाते तो राज ठाकरे खुद कैमरों को बुलाते। अभी से इतनी उतावली में खबर दिखाने की क्या जरूरत थी! बिना बुलावे के खबर बनाना समझदारी नहीं है।
 
थोड़े दिन पहले अन्ना हजारे के समर्थकों ने टीवी रिपोर्टरों के साथ हाथापाई की थी, न्यूज चैनल में बैठे संपादकों को सरेआम धमकी दी थी, लेकिन चैनलों ने कोई सबक नहीं सीखा। इन चैनल वालों ने पहले अन्ना को हीरो बनाया, हर जगह 'मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना' का माहौल बनाया। लेकिन जब टीम अन्ना ने इस हवा को भुनाने की कोशिश की तो ये चैनल वाले खाली मैदान दिखाने लगे, बार-बार बताने लगे कि इस बार जंतर-मंतर पर भीड़ नहीं पहुंची। अब भला यह भी कोई कहने की बात है! हद तो तब कर दी जब न्यूज चैनलों ने कहा- 'बाबा आए भीड़ लाए।' आपको भीड़ चाहिए थी, आ गई। अब यह बताने की क्या जरूरत है कि कौन लाया, कहां से लाया?
 
कांग्रेस की नाराजगी भी वाजिब है। जरा-से कोयला घोटाले को ये चैनल इतना बढ़ा-चढ़ाकर दिखा रहे हैं। चिदंबरम और कपिल सिब्बल जैसे बड़े-बड़े मिनिस्टर समझा रहे हैं कि कोई घोटाला नहीं हुआ, कोई नुकसान नहीं हुआ, पर ये न्यूज चैनल बार-बार 'कैग' की रिपोर्ट पर बहस करवा रहे हैं। सुषमा स्वराज के 'मोटा माल' पर चर्चा करवा रहे हैं, अरुण जेटली की प्रेस कांफ्रेंस लाइव दिखा रहे हैं। 'कैग' को इतना सिर पर बैठाने की क्या जरूरत है?
 
न्यूज चैनलों के लिए खबरों की कमी तो है नहीं। अंडर-19 की टीम ने वल्र्ड कप जीता, वह दिखाओ; धोनी की टीम ने न्यूजीलैंड को हराया, वह दिखाओ। सलमान खान की फिल्म हिट हुई है, करीना कपूर 'हलकट जवानी' पर ठुमक रही हैं, बच्चन साहब करोड़पति का नया सीजन लेकर आए हैं...लेकिन न्यूज चैनल वालों को तो सिर्फ कोयला घोटाला नजर आ रहा है!
 
असल में न्यूज चैनल वालों को किसी की बात समझ ही नहीं आती। गोपाल कांडा बताएंगे कि गीतिका मामले को कैसे राई से पहाड़ बना दिया, जुर्म साबित होने से पहले उनके मुंह पर कालिख पोत दी। दो-चार दिन कांडा छुप गए तो इतना शोर मचा दिया। अगर कहीं व्यस्त हो गए और पुलिस से नहीं मिले तो क्या हो गया! आखिर गोपाल बाबू राज्य में मंत्री रह चुके हैं। पुलिस की जरूरत क्या है, चैनल वालों से बेहतर समझते हैं। सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज काटजू कितनी बार कह चुके हैं कि न्यूज चैनल वालो, सुधर जाओ, पर उनकी कोई नहीं सुनता। काटजू साहब जानते हैं कि ये चैनल सिर्फ टीआरपी के चक्कर में रहते हैं। काटजू साहब ने पूछा था कि टीवी ने राजेश खन्ना की मौत को इतना क्यों दिखाया? देवआनंद की मौत पर भी टीवी ने बहुत शोर मचाया, यह भी उनको पसंद नहीं आया था। उन्होंने पूछा कि सचिन ने 100वां शतक बनाया तो उस पर न्यूज चैनलों को इतना शोर मचाने की क्या जरूरत थी। काटजू साहब इतने सनसनी भरे बयान देते हैं, उन्हें कोई नहीं दिखाता। वह प्रेस परिषद के चेयरमैन हैं, उनके सामने राजेश खन्ना, देवआनंद और तेंदुलकर की क्या बिसात!
 
अब सवाल यह है कि इन न्यूज चैनल वालों से जब सरकार, जज साहब, अपराधी, सिविल सोसायटी के नेता सब नाराज हैं तो फिर जनता इन्हें इतना क्यों देखती है! यह भोली-भाली गरीब जनता इनके साथ क्यों है? जरूर यह जनता इनके साथ मिली हुई है, वरना इन चैनलों की क्या औकात कि सिर उठाकर चलते रहें। जनता इन चैनलों के साथ क्यों है, इसका पर्दाफाश होना चाहिए। अगर इन्हें जल्दी न रोका गया तो ये न्यूज चैनल और जनता मिलकर लोकतंत्र को और मजबूत कर देंगे, फिर बाद में न कहना हमने चेतावनी नहीं दी थी!

धर्म और भूगोल से ऊपर 'हमारी बोली'



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 गोविंद सिंह, वरिष्ठ पत्रकार
इन दिनों पश्चिमी दुनिया में रह रहे भारतीय और पाकिस्तानी मूल के युवाओं में अपनी भाषा को लेकर एक नयी चेतना जाग रही है. वे हिन्दी और उर्दू को मिलाकर ‘हमारी बोली’ नाम से एक नयी भाषा को स्थापित करने के लिए दुनिया भर में आंदोलन छेड़े हुए हैं. वे व्यक्तिगत रूप से तो इस मिली जुली भाषा का प्रचार-प्रसार कर ही रहे हैं, साथ ही तमाम सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर भी जोर-शोर से अभियान छेड़े हुए हैं. वे यह भी चाहते हैं कि देवनागरी और अरबी लिपियों का झमेला छूटे और रोमन के जरिये काम चलने लगे।
 
हमारी बोली आन्दोलन के विस्तार में जाने से पहले इसकी पृष्ठभूमि में झांकें. इसमें कोई दो राय नहीं कि आजादी के बाद हिन्दी या राष्ट्रभाषा या राजभाषा का मसला भयानक उपेक्षा का शिकार रहा है. हमारे राजनेताओं ने अपने फायदे के लिए इसका दोहन तो बहुत किया लेकिन उसके प्रति अपनी जिम्मेदारी को कभी महसूस नहीं किया. नतीजा यह हुआ कि एक पूरी की पूरी पीढ़ी के मन में हिन्दी के प्रति हिकारत का भाव बना रहा. घटिया और भ्रष्ट अंग्रेजी बोलने और हिन्दी न जानने  में गर्व का भाव महसूस किया है हमारी पिछलीपीढ़ी ने. इसी कुंठा के साथ जब यह पीढ़ी वैज्ञानिक, इंजीनियर और प्राध्यापक बन कर यूरोप-अमेरिका गयी तो वहाँ भी इस कुंठा ने उसका पीछा नहीं छोड़ा. लेकिन संस्कृति के अन्य प्रतीकों को उन्होंने कभी नहीं छोड़ा. मसलन पूजा-पाठ, कर्म-कांड और शादी-व्याह जैसे अवसरों पर वे विशुद्ध भारतीय बने रहते, कम से कम अपने बच्चों को वैसा होने की नसीहत देते. सत्यनारायण की कथा, ओम जय जगदीश हरे, कराग्रे वसते लक्ष्मी, हनुमान चालीसा ... आदि-आदि के मामले में वे हिंदू बने रहते. उनका आग्रह रहता कि वे बहू हिन्दुस्तान से ही लाएं. वे पूजा-पाठ और शादी-व्याह जैसे अवसरों के लिए स्वदेश जरूर लौटते. आश्चर्य की बात यह है कि हिन्दी को उन्होंने कभी ऐसा स्थान नहीं दिया. वैसे यह बात भारतीय अभिजनों पर भी लागू होती है।
 
अपनी भाषा के प्रति ऐसे दोगले व्यवहार के ही कारण अनिवासी भारतीयों की नई पीढ़ी के मन में विद्रोह पैदा हुआ. वे न भारतीय रहे और न ही अमेरिकी हो पाए. उन्हें एबीसीडी यानी अमेरिका बोर्न कन्फ्यूज्ड देसी कहा जाने लगा. लेकिन अब इस दूसरी और तीसरी पीढ़ी के बच्चों के मन में अपनी जड़ों के प्रति अनुराग पैदा होने लगा है. चूंकि उनके मन में किसी तरह की कुंठा नहीं है, इसलिए वे भारत को अपने नज़रिए से देखना चाहते हैं. यहीं भाषा का मसला सामने आता है. एशियाई युवाओं, जिनमें भारतीय, नेपाली और पाकिस्तानी तो हैं ही, बंगलादेशी और कुछ हद तक श्रीलंकाई भी हैं, के मन में एक दक्षिण एशियाई भाषा का सपना कुलबुलाने लगा. उन्हें यह बात समझ में नहीं आती कि जो भाषा एक तरह से बोली जा रही हो, वह कैसे घर पहुँच कर हिन्दी और उर्दू में बदल जाती है. यों भी लिपियों से भाषा नहीं बनती, भाषा बनती है शब्दों, वाक्यों और ध्वनियों से. हाँ, लिपि भाषा का वाहन जरूर बनती है. यह लिपि की क्षमता पर निर्भर करता है कि वह कितनी कुशलता के साथ अपनी सवार भाषा को आगे ले जा सकती है. इसीलिए भाषा वैज्ञानिक हिंदी और उर्दू को दो भाषाएँ नहीं मानते. वे इसे दो लिपियों में एक भाषा कहते हैं. अमेरिकी स्कूलों में तो आज हिन्दी अध्यापक बनने के लिए दोनों लिपियों का ज्ञान जरूरी है।
 
संचार के क्षेत्र में नईटेक्नोलोजी के आने से नई पीढ़ी में अपनी भाषा के प्रति मोह यकायक उमड़ने लगा. लिपिउन्हें न देवनागरी आती थी और न ही अरबी. हाँ, उन्हें बोली आती थी, जिसे उन्होंनेअपने घरों में अपने बुजुर्गों को बोलते हुए सुना था. चाहे उसे हिन्दी कहिए याउर्दू. वे रोमन लिपि में धडल्ले से अपनी भाषा का प्रयोग करने लगे. ई-मेल, चैटिंग,सोशल मीडिया, सब तरफ रोमन हिन्दी का इस्तेमाल हो रहा है. यह बात भारत में भी बड़ेपैमाने पर हुई. फिल्मों के संवाद हों या टीवी की पटकथाएं, रोमन में हीअभिनेता-अभिनेत्रियों को दी जातीं. यूनिकोड में हिन्दी के आने से पहले तो बड़ेपैमाने पर रोमन का इस्तेमाल हुआ और मोबाइल में तो आज भी बहुत हो रहा है. विदेशयात्राओं पर जाने वाले हिन्दी पत्रकार रोमन में ही अपनी कॉपी भेजते. यहीं से हमारीबोली की अवधारणा जन्म लेने लगी. पाकिस्तानी पृष्ठभूमि के युवाओं को यह और भी जरूरीलगा, क्योंकि उनके यहाँ उर्दू लिपि कुछ देर से यूनिकोड में आई और देवनागरी कीतुलना में वह उतनी लोकप्रिय भी नहीं है. फिर अतीत यानी हिन्दी-उर्दू के उद्भव कालपर नजर दौडाई तो पाया कि ब्रिटिश भारत के पहले शिक्षा संस्थान फोर्ट विलियम कालेजके हेड मास्टर गिलक्राइस्ट ने भी दोनों भाषाओं के लिए रोमन लिपि की ही वकालत कीथी. उन्होंने हिन्दी-उर्दू के लिए जो रोमन सामानांतर दिए, आज भी वही चल रहे हैं. इसके अलावा वे १९९२ मेंशिकागो में हुए पहले अंतर्राष्ट्रीय उर्दू सम्मलेन में सैय्यद फसीह उद्दीन और कादर उन्नीस बेगम द्वारा प्रस्तुत उद्दीन-बेगम हिन्दी-उर्दू  रोमनीकरण स्कीम के भी अंध समर्थक हैं क्योंकि इस प्रस्ताव में भी हिन्दी-उर्दू और हिन्दुस्तानी के लिए रोमन लिपि की वकालत की गयी है।
 
हमारी बोली के प्रवर्तकों की दलील यह है कि देवनागरी और अरबी लिपियाँ चाहे-अनचाहे धार्मिक रूप सेएक-दूसरे को अस्वीकार्य हो गयी हैं. हिंदू समझते हैं कि अरबी लिपि इस्लाम की प्रतीक है और मुसलमान समझते हैं कि देवनागरी हिंदू धर्म से जुडी है. इस झगड़े में भाषा का अहित हो रहा है. दोनों भाषाएँ यदि एक हो जाएँ तो वह दुनिया की दूसरे नंबर की सबसे बड़ी भाषा बन जाती है. मंदारी के बाद. चीन ने भी ऐसा ही किया. वहाँ सांस्कृतिक क्रान्ति से पहले प्रचलित तमाम भाषाओं को मिलाकर आधुनिक चीनी बना दी गयी थी. जिसे हम मंदारी कहते हैं. साथ ही हमारी बोली वाले हिन्दी में से कठिन संस्कृतनिष्ठ शब्दों और उर्दू में से कठिन अरबी-फारसी शब्दों को हटाने और प्रचलित अंग्रेजी शब्दों को मिलाने की वकालत करते हैं।
 
ऊपर से उनकी बात ज्यादा व्यावहारिक लगती है. यदि हम अपनी नई पीढ़ी को देखें तो भाषा का यह नया रूप उनकेज्यादा करीब बैठता है. लेकिन जिस हमारी बोली की बात वे कह रहे हैं, उसकी सबसे कुशल वाहक देवनागरी ही है. देवनागरी का वर्तमान रूप भी अपनी लम्बी संशोधन यात्रा के बाद बना है. दुर्भाग्य यह है कि नई पीढ़ी को नागरी लिपि का पता ही नहीं है. यदि नई पीढ़ी देवनागरी की वैज्ञानिकता का बारीकी से अध्ययन करे तो वह पायेगी कि इसमें कितना दम है. उसे केवल हिंदू लिपि कह कर खारिज नहीं किया जा सकता. उसमें कुछ और संशोधन कर लिए जाएँ तो वह बखूबी नई भूमिका को निभा सकती है।

सोशल मीडिया का नया युग


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पी. के. खुराना, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार
कंप्यूटर का आविष्कार एक चमत्कार था, इंटरनेट एक और चमत्कार था और इसके बाद सोशल मीडिया भी एक चमत्कार है। एक और वेबसाइट टॉक2सेलेब्स.कॉम ने सोशल मीडिया में एक नये युग की शुरुआत की है। इसे ज़रा विस्तार से समझने की आवश्यकता है। सोशल मीडिया के इस ज़माने में हम ब्लॉग, फेसबुक, आर्कुट, नेटलॉग, ट्विटर आदि सोशल मीडिया साइटों के ज़रिये हम दुनिया भर से जुड़ गए हैं और हमारे मित्रों की संख्या हज़ारों में भी हो सकती है। सूचनाओं के प्रसार की गति अविश्वसनीय रूप से तेज़ हो गई है और सोशल मीडिया जनमत बनाने या जनमत को प्रभावित करने का एक उपयोगी और कारगर हथियार बन कर उभरा है। इंटरनेट और ईमेल ने हमारे जीवन के ढंग में एक क्रांतिकारी परिवर्तन किया था पर सोशल मीडिया ने तो एक कदम आगे जाकर सारी दुनिया को हमारी दहलीज पर ला दिया है। सोशल मीडिया ने कई सार्थक बहसों को जन्म दिया है और कई सामाजिक अभियानों को मजबूती प्रदान की है। हम सोशल मीडिया से जुड़े हों या न, हम सोशल मीडिया के पक्ष में हों या विरोध में, पर यह अब हमारे जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है और हम इससे बच नहीं सकते। इंटरनेट, सोशल मीडिया और स्मार्टफोन की त्रिवेणी ने अब एक ऐसी शक्तिपीठ की रचना की है कि उसके सामने पारंपरिक मीडिया का तेज फीका पड़ गया है। प्रतिष्ठित, प्रसिद्ध एवं विशिष्ट व्यक्तियों के लिए ट्विटर को अपनाना इसलिए आसान था क्योंकि यहां केवल 140 अक्षरों में ही अपनी बात समाप्त कर देने की स्वतंत्रता है, जो कहीं और संभव नहीं थी। सोशल नेटवर्किंग साइटों पर, बिना किसी खर्च के, मित्रों और प्रशंसकों के माध्यम से सेकेंडों में करोड़ों लोगों तक अपनी बात पहुंचाने की सुविधा ने इसे एकदम से ग्राह्य बना दिया। 

एक तरफ सोशल मीडिया ने प्रसिद्ध लोगों को अपने प्रशंसकों से जुडऩे का अवसर दिया तो दूसरी तरफ प्रशंसकों और सामान्य जन को भी प्रसिद्ध लोगों के मन में झांकने और उनके विचार जानने का मौका मिला। स्टार और सेलेब्रिटी माने जाने वाले विशिष्ट व्यक्ति पहले तो वेबसाइट और ब्लॉग के माध्यम से लोगों से जुड़े, परंतु वहां पहुंच सीमित थी क्योंकि जो व्यक्ति आपकी वेबसाइट पर नहीं आया, उसे आपके बारे में जानने का मौका नहीं मिलता था। फिर आर्कुट और फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साइटों ने तो जैसे धूम ही मचा दी। फेसबुक के साथ ही यूट्यूब, फ्लिकर और ट्विटर की लोकप्रियता भी बढ़ती चली गई और सोशल मीडिया साइटें हमारी जीवन का अभिन्न अंग बन गईं। हाल ही में पिंटेरेस्ट की चर्चा भी बढ़ी है, हालांकि अभी उसे सेलेब्रिटी स्टेटस नहीं मिला है। सोशल मीडिया साइटों में ट्विटर की अपनी अलग पहचान बन गई है क्योंकि व्यस्त लोगों के लिए भी अपने स्मार्टफोन से ही सिर्फ 140 अक्षरों में अपनी बात ट्वीट कर देने के लिए समय निकालना कठिन नहीं है और कई सेलेब्रिटीज़ तो दिनमें कई-कई बार ट्वीट करते हैं। अब यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि आज लगभग सभी विशिष्टजन ट्वीट की भाषा में बोलते हैं, और उनके करोड़ों-करोड़ों प्रशसंक पूरी निष्ठा से उनके ट्वीट पढ़ते हैं, उस पर चर्चा करते हैं, टिप्पणी करते हैं, टिप्पणियों पर टिप्पणी करते हैं। अपने मनपसंद सेलेब्रिटी से दोतरफा संवाद का ऐसा और कोई माध्यम नहीं है। अमरीकी गायिका लेडी गागा के ट्विटर एकाउंट पर प्रशंसकों की संख्या 2,78,48,540 है जो सऊदी अरेबिया, आस्ट्रेलिया और ग्रीस की सम्मिलित आबादी से भी ज्य़ादा है। कनाडा की पॉप संगीतकार जस्टीन बीबर के ट्विटर एकाउंट पर प्रशंसकों की संख्या 2,59,33,400 है। अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ट्विटर पर सर्वाधिक लोकप्रिय राजनीतिज्ञ हैं और उनके प्रशंसकों की संख्या 1,80,99,382 है जबकि फुटबाल खिलाड़ी क्रिस्टियानो रोनाल्डो के ट्विटर एकाउंट पर उनके प्रशंसकों की संख्या 1,20,73,467 है। भारतवर्ष में लोककथाओं के नायकों की मानिंद प्रसिद्ध अमिताभ बच्चन के हर ट्वीट को पढऩे के लिए 31,78,881 लोगों का बड़ा समूह हमेशा बेताब दिखता है। अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा और बालीवुड के बादशाह शाहरुख खान के ऑनलाइन प्रशंसकों की संख्या भी बहुत से नामी-गिरामी अखबारों से बहुत-बहुत ज्य़ादा है।

जैसे-जैसे मध्यवर्ग का विस्तार हो रहा है, मोबाइल फोन धारकों की संख्या बढ़ती जा रही है। मोबाइल फोन सस्ते होते जा रहे हैं और स्मार्टफोन अब एक आम चीज़ हैं। अब तो बहुत से 3-जी कंपैटिबल फोन भी इतने सस्ते हैं कि हर कोई उन्हें खरीद सकता है। इसके कारण भी इंटरनेट और सोशल मीडिया का उपयोग तेज़ी से बढ़ा है। सोशल मीडिया के इस उपभोग का ही परिणाम है कि अब प्रसिद्ध व्यक्तियों के ऑनलाइन प्रशंसकों की संख्या इतनी बढ़ गई है कि ये सेलेब्रिटी हस्तियां स्वयं एक माध्यम बनकर खुद भी ‘मीडिया’ की श्रेणी में आ गए हैं। बदलती परिस्थितियों के अनुरूप नई आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सदैव नई सुविधाओं, सेवाओं और उत्पादों की आवश्यकता रही है और विश्व में ऐसे लोगों की भी कमी नहीं रही जो नई आवश्यकताओं को समझ कर नई सुविधा, नई सेवा या नए उत्पाद प्रस्तुत करते रहे हैं और उसे दुनिया ने हाथों-हाथ लिया है। इसी तरह की एक वेबसाइट टॉक2सेलेब्स.कॉम है। इस वेबसाइट की खासियत यह है कि इसमें दुनिया भर के सेलेब्रिटीज़ के फेसबुक, ट्विटर, नेटलॉग, आर्कुट व यूट्यूब आदि लिंक शामिल हैं जहां आप किसी भी सेलेब्रिटी के सोशल मीडिया साइट पर उनसे चैट कर सकते हैं, कमेंट कर सकते हैं, कमेंट पर कमेंट कर सकते हैं और उसे अपने मित्रों के साथ शेयर कर सकते हैं। टॉक2सेलेब्स.कॉम के साथ सोशल मीडिया का एक और नया युग शुरू हुआ है। सेलेब्रिटीज़ के विचारों और कामों से समाज प्रभावित होता है, प्रेरित होता है। टॉक2सेलेब्स.कॉम ने पहली बार सभी सेलेब्रिटीज़ को एक ही मंच पर ला दिया है। यही नहीं इसमें हॉलीवुड, बॉलीवुड, राजनीति, व्यवसाय, पत्रकारिता, कला, विज्ञान आदि सभी क्षेत्रों के विशिष्ट जनों का समावेश है। 

सोशल मीडिया की खासियत यह है कि इसके माध्यम से आप समाचार पा सकते हैं और समाचार दे सकते हैं। यह दो-तरफा संवाद है जहां आपको दुनिया भर की खबरें मिलती हैं और आप दुनिया भर को अपनी खबर दे सकते हैं। उससे भी बड़ी बात यह है कि सोशल मीडिया ऐसा अखबार है जिसे खरीदना नहीं पड़ता और जिसके प्रकाशन पर भी आपको कोई खर्च नहीं करना पड़ता। इसके अलावा सोशल मीडिया के माध्यम से आप दुनिया के हर कोने से एक साथ जुड़ जाते हैं। सोशल मीडिया की इसी खूबी ने इसे इतना खास बना दिया है कि सारी दुनिया सोशल मीडिया में सिमट गई है। इसी कड़ी में टॉक2सेलेब्स.कॉम ने एक नये युग की शुरुआत तो की है, पर क्या यह किसी अगले चमत्कार की वजह भी बन पायेगा? यह देखना अभी बाकी है कि इस कड़ी का अगला चमत्कार क्या होगा।

चौदह साल का गूगल और हम




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 पीयूष पांडे, वरिष्ठ पत्रकार   
सत्ताइस सितंबर को 'गूगल' पूरे 14 साल का हो गया। 'गूगल डॉट कॉम' डोमेन को 15 सितंबर 1998 को रजिस्टर्ड कराया गया था। हालांकि, 'गूगल' शुरुआती दौर में सात सितंबर को अपना जन्मदिन मनाता था, लेकिन 'याहू' से हुई एक प्रतिस्पर्धा के बाद 'गूगल' ने 2005 में अपना आधिकारिक जन्मदिन 27 सितंबर को घोषित किया। स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के दो छात्रों लैरी पेज और सर्गेइ बिन ने 1996 में ही सर्च इंजन बना लिया था, लेकिन 'गूगल' के तौर पर दुनिया के सामने लाने में उन्हें दो साल का वक्त और लगा। 
14 साल में 'गूगल' के साथ पूरी एक पीढ़ी किशोर हो गई। इंटरनेट की चमत्कारी दुनिया से रूबरू होते लाखों-करोड़ों बच्चे गूगल के साथ जवान हो गए। अतिशयोक्ति में बहते बयान लगभग सच जान पड़ते हैं, जब लोग कहते हैं कि 'गूगल'के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। 'गूगल सर्च इंजन' के गर्भ में हर सवाल का जवाब दिखता है। यूं देखने का एक नजरिया लेखक निकोलस कार जैसे लेखकों का भी है। निकोलस ने 2008 में द एटलांटिक मंथली में 'क्या गूगल हमें बुद्धू बना रहा है' शीर्षक से एक लेख लिखा था। उन्होंने लिखा था कि 'गूगल' के जरिए हमें सूचनाएं तो बहुत तेजी से मिल जाती हैं, लेकिन यह हमें इस बात के लिए उकसाता है कि हम किसी बात पर ज्यादा न सोचें।

निस्संदेह निकोलस का तर्क बिल्कुल गलत नहीं है। लेकिन सच यह भी है कि 'गूगल' ने इंटरनेट पर उपलब्ध लाखों-करोड़ों पेजों में छितरी सूचनाओं को एक झटके में सामने लाने वाली तकनीक दी है। गूगल से पहले भी 'याहू' और 'अल्टाविस्टा' सरीखे सर्च इंजन थे पर गूगल की लोकप्रियता की बड़ी वजह बनी उसकी खोज प्रणाली। गूगल का बड़ा योगदान इंसान की जिज्ञासु प्रकृति को पल में शांत करना है। 
14 साल में 'गूगल' ने अपना ब्रांड सर्च इंजन और 'ई-मेल' सेवा यानी जी-मेल की वजह से बनाया। लेकिन, महज 14 साल में गूगल दुनिया के सबसे प्रमुख वैश्विक ब्रांड में शुमार हो गया है और इसकी बड़ी वजह है प्रयोगशीलता। गूगल सर्च इंजन, ई-मेल, ब्राउजर, सोशल नेटवर्किंग साइट और इंटरनेट के तमाम दूसरे एप्लीकेशंस से आगे पहुंच लगातार नए प्रयोग कर रहा है। इस कड़ी में हाल में उसने दुनिया का सबसे तेज इंटरनेट सेवा प्रदाता बनने की राह पकड़ी है। 'गूगल' ने अल्ट्रा हाईस्पीड इंटरनेट सेवा लांच की है। इसकी स्पीड एक जीबी प्रति सेकेंड होगी। यह मौजूदा इंटरनेट स्पीड से तकरीबन 100 गुना अधिक होगा। शुरुआती दौर में 'गूगल' ने इस सेवा को अमेरिका के सिर्फ दो शहरों कंसास और मिसौरी में लांच किया है, जिसका जल्द विस्तार होगा।
गूगल को अपनी प्रयोगधर्मिता और बाजार की नब्ज समझने की विशेषज्ञता का लाभ भी मिल रहा है। 2012 की दूसरी तिमाही में ही 'गूगल' ने 2.79 बिलियन डॉलर का मुनाफा दर्ज किया है। ऑनलाइन डिसप्ले विज्ञापन के मामले में 'फेसबुक' अभी 'गूगल' से आगे है, लेकिन ई-मार्केटर के मुताबिक 2013 में 'गूगल' फेसबुक को पछाड़ देगा। शेयर बाजार में भी गूगल का जलवा बरकरार है। लेकिन मुद्दा मुनाफे के आंकड़ों का नहीं इंटरनेट की दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी की विश्वसनीयता का है। मुद्दा 'गूगल' की महात्वाकांक्षाओं का है और मसला 'गूगल' के एकाधिकार का है। दुनिया भर की कई कंपनियों और संगठनों को 'गूगल' के सर्च प्रणाली पर शक है। यूरोपीय यूनियन में भी 'गूगल' की सर्च रैंकिंग के खिलाफ जांच चल रही है। सीनेट ने भी 'गूगल' से सवाल किए। गूगल सर्च इंजन के नतीजे लोगों के फैसले लेने में इतने अधिक अहम हो गए हैं कि उन कंपनियों की चिंता स्वाभाविक है, जो कभी रैंकिंग में जगह नहीं बना पातीं। निश्चित तौर पर गूगल सर्च के नतीजे एक झटके में छोटी कंपनी को बड़ी बना सकते हैं और बड़ी को करारा झटका दे सकते हैं।

'गूगल' की कारोबारी महत्वाकांक्षा बाजार में उसके प्रभुत्व को बनाए रखने में मददगार है, लेकिन चिंताजनक भी है। इसकी एक झलक इंटरनेट पर वेब पतों का प्रबंधन देखने वाली संस्था इंटरनेट कॉर्पोरेशन फॉर असाइंड नेम्स एंड नंबर यानी आईसीएएनएन द्वारा जारी उच्च स्तरीय डोमेन नामों की सूची में भी दिखी। सूची से साफ हुआ था कि इंटरनेट की जमीन को जोतने के लिए 'गूगल' सबसे ज्यादा बेचैन है। आईसीएएनएन को मिले कुल 1930 आवेदनों में 'गूगल' ने सबसे ज्यादा यानी करीब 100 आवेदन किए हैं। 'गूगल' ने डॉट गूगल, डट यूट्यूब, डॉट प्लस, डॉट गूग जैसे तय नामों के अलावा डॉट बेबी, डॉट फ्लाई, डॉट ईट जैसे कई नामों पर भी दावा ठोंका है। 
इंटरनेट पर 'गूगल' का वर्चस्व साफ दिखाई देता है। सर्च इंजन गूगल और ईमेल सेवा 'जीमेल' से लेकर वीडियो शेयरिंग साइट 'यूट्यूब'और सोशल नेटवर्किंग साइट गूगल प्लस जैसी तमाम प्रमुख साइटों पर 'गूगल' का कब्जा है। लोकप्रिय मोबाइल ऑपरेटिंग सॉफ्टवेयर एंड्रॉयड गूगल का है। इंटरनेट पर अलग अलग क्षेत्रों की कई कंपनियों को हाल में 'गूगल' ने खरीदा है। इंटरनेट और टीवी की सुविधा देने वाला गूगल टीवी बाजार में लांच हो चुका है। नई इंटरनेट अर्थव्यवस्था में तमाम बड़ी कंपनियों के लिए उपयोक्ताओं से जुड़ी सूचनाएं ही सबसे बड़ी पूंजी है। फेसबुक, गूगल, याहू सभी को इस श्रेणी में रखा जा सकता है। 'गूगल' के पास तो इतना डाटा है कि उसका दुरुपयोग लगभग तबाही मचा सकता है। 'गूगल' का एकाधिकार महत्वपूर्ण प्रश्न है। लेकिन, इस लड़ाई के बीच हम क्या करें? बड़ा सवाल यही है कि क्या हमारे उपयोक्ताओं के पास दूसरे बेहतर विकल्प हैं ?

बोलने की आज़ादी और देशद्रोह



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प्रमोद जोशी, वरिष्ठ पत्रकार
 
असीम त्रिवेदी के बहाने चली बहस का एक फायदा यह हुआ कि सरकार ने इस 142 साल पुराने देशद्रोह कानून को बदलने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। मीडिया से सम्बद्ध ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स ने गृह मंत्रालय से इस दिशा में काम करने का अनुरोध किया है। कानूनों का अनुपालन कराने वाली एजेंसियाँ अक्सर सरकार-विरोध  को देश-विरोध समझ बैठती हैं। सूचना एवें प्रसारण मंत्री अम्बिका सोनी ने जीओएम के प्रमुख पी चिदम्बरम को पत्र लिखकर अनुरोध किया है कि दंड संहिता की धारा 124 ए का समुचित संशोधन होना चाहिए। चिदम्बरम ने उनसे सहमति व्यक्त की है। विडंबना है कि इसी दौरान तमिलनाडु में कुडानकुलम में नाभिकीय बिजलीघर लगाने के विरोध में आंदोलन चला रहे लोगों के खिलाफ देशद्रोह के आरोप लगा दिए गए हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शासन के प्रति विरोध और विद्रोह में काफी महीन रेखा है। हम आसानी से यह कहते हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा है। हम सीमा पर ज़ोर देने लगे हैं, जबकि मूल संविधान में यह सीमा नहीं थी। देश के पहले संविधान संशोधन के मार्फत हमारे संविधान में युक्तिसंगत पाबंदियाँ लगाने का प्रावधान शामिल किया गया। विचार-विनिमय की स्वतंत्रता लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण कारक है। किसी ने सवाल किया कि गाली देना क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हो सकती है? वस्तुतः हम भूलते हैं कि मौलिक अधिकार राज्य के बरक्स होते हैं। दो व्यक्तियों के बीच की गाली-गलौज के लिए दूसरे कानून हैं। राज्य की आलोचना के आधार दूसरे हैं। इस पोस्ट में मेरी ज्यादातर सामग्री दो साल पहले की एक पोस्ट से ली गई है। कुछ जगह नए संदर्भ जोड़े हैं। इस मामले में जैसे ही बहस आगे बढ़ती है तब यह सवाल आता है कि क्या हमारे देश, राज्य, सरकार, व्यवस्था का गरीब जनता से कोई वास्ता है? राष्ट्रीय चिह्नों की चिंता काफी लोगों को है, पर इनसान के रूप में जो जीवित राष्ट्रीय चिह्न मौज़ूद हैं उनका अपमान होता है तो कैसा लगता है?


नवम्बर 2010 में साल का नोबेल शांति पुरस्कार चीन के मानवाधिकारवादी ल्यू श्याओबो को देने की घोषणा की गई। इसे लेकर चीन सरकार ने गहरी नाराज़गी ज़ाहिर की थी। चीन के साथ अपनी मैत्री को साबित करने के लिए पाकिस्तान ने भी इस पुरस्कार पर हैरत और परेशानी का इज़हार किया है। नोबेल शांति पुरस्कार पर आमतौर पर राजनीति का मुलम्मा चढ़ा रहता है, पर वह पश्चिम का सम्मानित पुरस्कार है। यह भी सच है कि मानवाधिकारों को लेकर जो दिलचस्पी पश्चिमी देशों में है, वह हमारे जैसे पूर्वी देशों में नहीं है। चीन में साम्यवादी व्यवस्था से असहमति देशद्रोह के दायरे में आती है। इन दिनों विकीलीक्स के संस्थापक जूलियन असांज और उन्हें इक्वेडोर द्वारा दी गई शरण विचार का विषय है। असांज को अपने देश से नहीं अमेरिका से शिकायत है। 
एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच जैसी संस्थाओं की जो रपटें पाकिस्तान, चीन या अफ्रीकी देशों के खिलाफ जाती हैं हम उनपर विस्तार से चर्चा करते हैं, पर जब हमारी व्यवस्था का जिक्र होता है तो हम उसे पश्चिमी भेदभाव के रूप में देखते हैं। विडंबना है कि इन दिनों मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की ज़रूरत एक ओर धुर वामपंथी कार्यकर्ता महसूस कर रहे हैं वहीं कश्मीर के गिलानी जैसे नेता महसूस करते हैं, जिनकी लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के बारे में एक जैसी धारणा नहीं है। पर हम इस अधिकार की उपेक्षा नहीं कर सकते हैं। यह अधिकार है तो इसे व्यावहारिक रूप से लागू भी होना चाहिए। दो साल पहले अरुंधती रॉय ने कहा कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग कभी नहीं रहा। ऐसा उन्होंने पहली बार नहीं कहा। वे इसके पहले भी यह बात कह चुकी हैं। महत्वपूर्ण था उनका दिल्ली की एक सभा में ऐसा कहना। उस सभा में सैयद अली शाह गिलानी भी बोले थे। उनके अलावा पूर्वोत्तर के कुछ राजनैतिक कार्यकर्ता इस सभा में थे। देश की राजधानी में भारतीय राष्ट्र राज्य के बारे में खुलकर ऐसी चर्चा ने बड़ी संख्या में लोगों को मर्माहत किया, सदमा पहुँचाया। पहले रोज़ मीडिया में जब इसकी खबरें छपीं तब तक यह सनसनीखेज़ खबर भर थी। इसके बाद भारतीय जनता पार्टी ने इस सभा में विचार व्यक्त करने वालों पर देशद्रोह का मुकदमा चलाने की माँग की तब अचानक लोगों को लगा कि यह तो देशद्रोह हो गया है।
अरुंधती रॉय के वक्तव्य से जुड़े अनेक मसले हैं, जिनपर मीडियाकर्मी होने के नाते हमें ध्यान देना चाहिए। उन्होंने जो कहा वह देशद्रोह था या नहीं? दूसरे इस प्रकार के संवेदनशील मसलों को किस तरह रिपोर्ट किया जाय? तीसरे कभी ऐसा मौका आ पड़े जब हमें इंसानियत और राष्ट्रप्रेम के बीच चुनाव करना हो तो क्या करें? मीडिया के मार्फत हमारा समाज विचार-विमर्श भी करता है और जानकारी भी हासिल करता है, इसलिए हमारा फर्ज़ होता है कि इसके मार्फत हम पूरी कोशिश करें कि दोनों काम वस्तुगत(ऑब्जेक्टिवली) पूरे हों। हमारा कोई भी दृष्टिकोण हो दूसरे सभी दृष्टिकोणों को सामने रखें। यह बेहद मुश्किल काम है।
हमारे संविधान का अनुच्छेद 19(1) ए नागरिकों को अपनी बात कहने का अधिकार देता है। इस अधिकार पर कुछ पाबंदियाँ भी हैं। अनुच्छेद19(2) ए में कहा गया है कि अनुच्छेद 19(1)ए के होते हुए भी भारत की एकता और अखंडता, देश की सुरक्षा, वैदेशिक रिश्तों, लोक व्यवस्था,  मानहानि, अश्लीलता आदि के मद्देनज़र इस अधिकार को नियंत्रित तथा सीमित किया जा सकता है। भारतीय दंड संहिता की धारा 121ए तथा124ए के अंतर्गत देशद्रोह दंडनीय अपराध हैं। 124ए में उन गतिविधियों के तीन स्पष्टीकरण हैं, जिन्हें देशद्रोह माना जा सकता है। इन स्पष्टीकरणों के बाद भी केदारनाथ बनाम बिहार राज्य के मामले में 1962 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक सशस्त्र विद्रोह या हिंसा के इस्तेमाल की अपील न हो तब तक कुछ भी राजद्रोह नहीं है। मोटे तौर पर राष्ट्र-राज्य से असहमति को देशद्रोह नहीं मानना चाहिए।
सन 1922 में अंग्रेज सरकार ने महात्मा गांधी और शंकरलाल घेलाभाई बैंकर पर ‘यंग इंडिया’ में प्रकाशित तीन लेखों को लेकर आईपीसी की धारा124 ए के तहत मुकदमा चलाया। हालांकि महात्मा गांधी और बैंकर ने शुरू में ही आरोप को स्वीकार कर लिया, इसलिए मुकदमे को आगे बढ़ाने की ज़रूरत नहीं थी, पर सरकारी एडवोकेट जनरल सर स्ट्रैंगमैन का आग्रह था कि कार्यवाही पूरी की जाय।
बीसवीं सदी में अभिव्यक्ति के अधिकार को लेकर काफी विचार-विमर्श हुआ। खासतौर से अमेरिका के वियतनाम,अफगानिस्तान और इराक अभियानों के मद्देनज़र। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान देश-द्रोह और देश-भक्ति जैसे जुम्ले ज्यादा ज़ोरदार ढंग से उछले। बीबीसी तक पर कई बार संदेह किया गया। वियतनाम और इराक में कार्रवाई के दौरान अमेरिका में सरकार-विरोधी रैलियाँ निकलतीं रहीं। अच्छा हुआ कि अरुंधती रॉय के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई। इससे हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था मजबूत ही हुई है। कमज़ोर नहीं हुई।  अरुंधती रॉय के विचार-व्यक्त करने के अधिकार का समर्थन एक बात है और उनके विचारों का समर्थन दूसरी बात है। कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है या नहीं इस बारे में कम से कम उन्हें विशेषज्ञ नहीं माना जा सकता। कश्मीर पर कोई भी दृष्टिकोण तब तक अधूरा है, जब तक उसके सारे पहलू साफ न हों। कश्मीरी पंडित डोगरे और लद्दाख के बौद्ध गिलानी साहब के इस्लामी एजेंडा में फिट नहीं होते। कश्मीर की स्वतंत्रता एक अलग मसला है और उसे पाकिस्तान में शामिल कराने की कामना दूसरा मसला है। अरुंधती रॉय की भारतीय राष्ट्र-राज्य के बारे में तमाम धारणाओं से सहमति और असहमति व्यक्त की जा सकती है। कश्मीर पर वे क्या चाहतीं हैं, यह बात साफ नहीं है। इस मामले में गिलानी और कश्मीर के दूसरे अलगाववादियों के बीच भी मतभेद हैं।
मुम्बई की आदर्श हाउसिंग सोसायटी के घपले, कॉमनवेल्थ गेम्स के घोटालों और उसके पहले शेयर बाज़ार से लेकर हवाला तक के घोटालों को देखें तो हमें इस व्यवस्था में तमाम खोट नज़र आएंगे। हैरत इस बात पर है कि हमारा मीडिया इन मामलों की तह तक नहीं जाता। इसकी एक वज़ह यह है कि मीडिया का लक्ष्य बिजनेस है जन-कल्याण नहीं। राष्ट्रवाद के भावनात्मक पहलू का फायदा तो वह उठाना चाहता है, पर राष्ट्रीय कल्याण के व्यावहारिक मसलों की तफतीश नहीं करना चाहता। भ्रष्टाचार के मसलों पर हमारा मीडिया सरकारी भ्रष्टाचार पर नज़र रखता है, पर कॉरपोरेट भ्रष्टाचार पर चर्चा से बचता है, जहाँ उसके व्यावसायिक हित जुड़े होते हैं।
शुरुआत में मैने चीन के मानवाधिकार कार्यकर्ता ल्यू श्याओबो का ज़िक्र किया था। चीन के संविधान के अनुच्छेद 35 के तहत वहाँ के नागरिकों को अभिव्यक्ति, अखबार निकालने, सभा करने, संगठन बनाने और आंदोलन करने तक की आज़ादी है। यह आज़ादी काग़ज़ी है। हमारे संविधान की आज़ादियाँ अपेक्षाकृत कम काग़ज़ी हैं, पर पूरी वे भी नहीं हैं। हमारा आदर्श वाक्य सत्यमेव जयते पूरी तरह लागू होना चाहिए। इसके लिए कम से कम अपनी बात कहने का हक तो होना चाहिए। अपने देश से प्रेम इसलिए होना चाहिए कि हम इसमें रहने वाले लोगों को न्यायपूर्ण व्यवस्था देना चाहते हैं, उनकी खुशहाली चाहते हैं। देश-प्रेम और मनुष्य-मात्र से प्रेम के बीच कोई टकराव नहीं होता।  
इस पूरे मामले में व्यक्ति के अधिकार का मसला मेरे विचार से महत्वपूर्ण है। अरुंधती रॉय के समग्र राजनैतिक विचारों में कुछ बातें आकर्षित करती हैं और बहुत सी नहीं करतीं।