Saturday, 13 October 2012

फिर न कहना हमने चेतावनी नहीं दी थी !


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 रजत शर्मा, एडिटर-इन-चीफ, इंडिया टीवी
राज ठाकरे ठीक कह रहे हैं कि ये न्यूज चैनल वाले बिना सोचे-समझे खबरें दिखाते हैं। राज ने सिर्फ इतना कहा था कि वह बिहारियों को महाराष्ट्र से बाहर फिंकवा देंगे। इसको अभी से खबर बनाने की क्या जरूरत थी? वह जब दो-चार लोगों को फिंकवा देते, पिटाई करवाते तो राज ठाकरे खुद कैमरों को बुलाते। अभी से इतनी उतावली में खबर दिखाने की क्या जरूरत थी! बिना बुलावे के खबर बनाना समझदारी नहीं है।
 
थोड़े दिन पहले अन्ना हजारे के समर्थकों ने टीवी रिपोर्टरों के साथ हाथापाई की थी, न्यूज चैनल में बैठे संपादकों को सरेआम धमकी दी थी, लेकिन चैनलों ने कोई सबक नहीं सीखा। इन चैनल वालों ने पहले अन्ना को हीरो बनाया, हर जगह 'मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना' का माहौल बनाया। लेकिन जब टीम अन्ना ने इस हवा को भुनाने की कोशिश की तो ये चैनल वाले खाली मैदान दिखाने लगे, बार-बार बताने लगे कि इस बार जंतर-मंतर पर भीड़ नहीं पहुंची। अब भला यह भी कोई कहने की बात है! हद तो तब कर दी जब न्यूज चैनलों ने कहा- 'बाबा आए भीड़ लाए।' आपको भीड़ चाहिए थी, आ गई। अब यह बताने की क्या जरूरत है कि कौन लाया, कहां से लाया?
 
कांग्रेस की नाराजगी भी वाजिब है। जरा-से कोयला घोटाले को ये चैनल इतना बढ़ा-चढ़ाकर दिखा रहे हैं। चिदंबरम और कपिल सिब्बल जैसे बड़े-बड़े मिनिस्टर समझा रहे हैं कि कोई घोटाला नहीं हुआ, कोई नुकसान नहीं हुआ, पर ये न्यूज चैनल बार-बार 'कैग' की रिपोर्ट पर बहस करवा रहे हैं। सुषमा स्वराज के 'मोटा माल' पर चर्चा करवा रहे हैं, अरुण जेटली की प्रेस कांफ्रेंस लाइव दिखा रहे हैं। 'कैग' को इतना सिर पर बैठाने की क्या जरूरत है?
 
न्यूज चैनलों के लिए खबरों की कमी तो है नहीं। अंडर-19 की टीम ने वल्र्ड कप जीता, वह दिखाओ; धोनी की टीम ने न्यूजीलैंड को हराया, वह दिखाओ। सलमान खान की फिल्म हिट हुई है, करीना कपूर 'हलकट जवानी' पर ठुमक रही हैं, बच्चन साहब करोड़पति का नया सीजन लेकर आए हैं...लेकिन न्यूज चैनल वालों को तो सिर्फ कोयला घोटाला नजर आ रहा है!
 
असल में न्यूज चैनल वालों को किसी की बात समझ ही नहीं आती। गोपाल कांडा बताएंगे कि गीतिका मामले को कैसे राई से पहाड़ बना दिया, जुर्म साबित होने से पहले उनके मुंह पर कालिख पोत दी। दो-चार दिन कांडा छुप गए तो इतना शोर मचा दिया। अगर कहीं व्यस्त हो गए और पुलिस से नहीं मिले तो क्या हो गया! आखिर गोपाल बाबू राज्य में मंत्री रह चुके हैं। पुलिस की जरूरत क्या है, चैनल वालों से बेहतर समझते हैं। सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज काटजू कितनी बार कह चुके हैं कि न्यूज चैनल वालो, सुधर जाओ, पर उनकी कोई नहीं सुनता। काटजू साहब जानते हैं कि ये चैनल सिर्फ टीआरपी के चक्कर में रहते हैं। काटजू साहब ने पूछा था कि टीवी ने राजेश खन्ना की मौत को इतना क्यों दिखाया? देवआनंद की मौत पर भी टीवी ने बहुत शोर मचाया, यह भी उनको पसंद नहीं आया था। उन्होंने पूछा कि सचिन ने 100वां शतक बनाया तो उस पर न्यूज चैनलों को इतना शोर मचाने की क्या जरूरत थी। काटजू साहब इतने सनसनी भरे बयान देते हैं, उन्हें कोई नहीं दिखाता। वह प्रेस परिषद के चेयरमैन हैं, उनके सामने राजेश खन्ना, देवआनंद और तेंदुलकर की क्या बिसात!
 
अब सवाल यह है कि इन न्यूज चैनल वालों से जब सरकार, जज साहब, अपराधी, सिविल सोसायटी के नेता सब नाराज हैं तो फिर जनता इन्हें इतना क्यों देखती है! यह भोली-भाली गरीब जनता इनके साथ क्यों है? जरूर यह जनता इनके साथ मिली हुई है, वरना इन चैनलों की क्या औकात कि सिर उठाकर चलते रहें। जनता इन चैनलों के साथ क्यों है, इसका पर्दाफाश होना चाहिए। अगर इन्हें जल्दी न रोका गया तो ये न्यूज चैनल और जनता मिलकर लोकतंत्र को और मजबूत कर देंगे, फिर बाद में न कहना हमने चेतावनी नहीं दी थी!

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