Saturday, 13 October 2012

चौदह साल का गूगल और हम




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 पीयूष पांडे, वरिष्ठ पत्रकार   
सत्ताइस सितंबर को 'गूगल' पूरे 14 साल का हो गया। 'गूगल डॉट कॉम' डोमेन को 15 सितंबर 1998 को रजिस्टर्ड कराया गया था। हालांकि, 'गूगल' शुरुआती दौर में सात सितंबर को अपना जन्मदिन मनाता था, लेकिन 'याहू' से हुई एक प्रतिस्पर्धा के बाद 'गूगल' ने 2005 में अपना आधिकारिक जन्मदिन 27 सितंबर को घोषित किया। स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के दो छात्रों लैरी पेज और सर्गेइ बिन ने 1996 में ही सर्च इंजन बना लिया था, लेकिन 'गूगल' के तौर पर दुनिया के सामने लाने में उन्हें दो साल का वक्त और लगा। 
14 साल में 'गूगल' के साथ पूरी एक पीढ़ी किशोर हो गई। इंटरनेट की चमत्कारी दुनिया से रूबरू होते लाखों-करोड़ों बच्चे गूगल के साथ जवान हो गए। अतिशयोक्ति में बहते बयान लगभग सच जान पड़ते हैं, जब लोग कहते हैं कि 'गूगल'के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। 'गूगल सर्च इंजन' के गर्भ में हर सवाल का जवाब दिखता है। यूं देखने का एक नजरिया लेखक निकोलस कार जैसे लेखकों का भी है। निकोलस ने 2008 में द एटलांटिक मंथली में 'क्या गूगल हमें बुद्धू बना रहा है' शीर्षक से एक लेख लिखा था। उन्होंने लिखा था कि 'गूगल' के जरिए हमें सूचनाएं तो बहुत तेजी से मिल जाती हैं, लेकिन यह हमें इस बात के लिए उकसाता है कि हम किसी बात पर ज्यादा न सोचें।

निस्संदेह निकोलस का तर्क बिल्कुल गलत नहीं है। लेकिन सच यह भी है कि 'गूगल' ने इंटरनेट पर उपलब्ध लाखों-करोड़ों पेजों में छितरी सूचनाओं को एक झटके में सामने लाने वाली तकनीक दी है। गूगल से पहले भी 'याहू' और 'अल्टाविस्टा' सरीखे सर्च इंजन थे पर गूगल की लोकप्रियता की बड़ी वजह बनी उसकी खोज प्रणाली। गूगल का बड़ा योगदान इंसान की जिज्ञासु प्रकृति को पल में शांत करना है। 
14 साल में 'गूगल' ने अपना ब्रांड सर्च इंजन और 'ई-मेल' सेवा यानी जी-मेल की वजह से बनाया। लेकिन, महज 14 साल में गूगल दुनिया के सबसे प्रमुख वैश्विक ब्रांड में शुमार हो गया है और इसकी बड़ी वजह है प्रयोगशीलता। गूगल सर्च इंजन, ई-मेल, ब्राउजर, सोशल नेटवर्किंग साइट और इंटरनेट के तमाम दूसरे एप्लीकेशंस से आगे पहुंच लगातार नए प्रयोग कर रहा है। इस कड़ी में हाल में उसने दुनिया का सबसे तेज इंटरनेट सेवा प्रदाता बनने की राह पकड़ी है। 'गूगल' ने अल्ट्रा हाईस्पीड इंटरनेट सेवा लांच की है। इसकी स्पीड एक जीबी प्रति सेकेंड होगी। यह मौजूदा इंटरनेट स्पीड से तकरीबन 100 गुना अधिक होगा। शुरुआती दौर में 'गूगल' ने इस सेवा को अमेरिका के सिर्फ दो शहरों कंसास और मिसौरी में लांच किया है, जिसका जल्द विस्तार होगा।
गूगल को अपनी प्रयोगधर्मिता और बाजार की नब्ज समझने की विशेषज्ञता का लाभ भी मिल रहा है। 2012 की दूसरी तिमाही में ही 'गूगल' ने 2.79 बिलियन डॉलर का मुनाफा दर्ज किया है। ऑनलाइन डिसप्ले विज्ञापन के मामले में 'फेसबुक' अभी 'गूगल' से आगे है, लेकिन ई-मार्केटर के मुताबिक 2013 में 'गूगल' फेसबुक को पछाड़ देगा। शेयर बाजार में भी गूगल का जलवा बरकरार है। लेकिन मुद्दा मुनाफे के आंकड़ों का नहीं इंटरनेट की दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी की विश्वसनीयता का है। मुद्दा 'गूगल' की महात्वाकांक्षाओं का है और मसला 'गूगल' के एकाधिकार का है। दुनिया भर की कई कंपनियों और संगठनों को 'गूगल' के सर्च प्रणाली पर शक है। यूरोपीय यूनियन में भी 'गूगल' की सर्च रैंकिंग के खिलाफ जांच चल रही है। सीनेट ने भी 'गूगल' से सवाल किए। गूगल सर्च इंजन के नतीजे लोगों के फैसले लेने में इतने अधिक अहम हो गए हैं कि उन कंपनियों की चिंता स्वाभाविक है, जो कभी रैंकिंग में जगह नहीं बना पातीं। निश्चित तौर पर गूगल सर्च के नतीजे एक झटके में छोटी कंपनी को बड़ी बना सकते हैं और बड़ी को करारा झटका दे सकते हैं।

'गूगल' की कारोबारी महत्वाकांक्षा बाजार में उसके प्रभुत्व को बनाए रखने में मददगार है, लेकिन चिंताजनक भी है। इसकी एक झलक इंटरनेट पर वेब पतों का प्रबंधन देखने वाली संस्था इंटरनेट कॉर्पोरेशन फॉर असाइंड नेम्स एंड नंबर यानी आईसीएएनएन द्वारा जारी उच्च स्तरीय डोमेन नामों की सूची में भी दिखी। सूची से साफ हुआ था कि इंटरनेट की जमीन को जोतने के लिए 'गूगल' सबसे ज्यादा बेचैन है। आईसीएएनएन को मिले कुल 1930 आवेदनों में 'गूगल' ने सबसे ज्यादा यानी करीब 100 आवेदन किए हैं। 'गूगल' ने डॉट गूगल, डट यूट्यूब, डॉट प्लस, डॉट गूग जैसे तय नामों के अलावा डॉट बेबी, डॉट फ्लाई, डॉट ईट जैसे कई नामों पर भी दावा ठोंका है। 
इंटरनेट पर 'गूगल' का वर्चस्व साफ दिखाई देता है। सर्च इंजन गूगल और ईमेल सेवा 'जीमेल' से लेकर वीडियो शेयरिंग साइट 'यूट्यूब'और सोशल नेटवर्किंग साइट गूगल प्लस जैसी तमाम प्रमुख साइटों पर 'गूगल' का कब्जा है। लोकप्रिय मोबाइल ऑपरेटिंग सॉफ्टवेयर एंड्रॉयड गूगल का है। इंटरनेट पर अलग अलग क्षेत्रों की कई कंपनियों को हाल में 'गूगल' ने खरीदा है। इंटरनेट और टीवी की सुविधा देने वाला गूगल टीवी बाजार में लांच हो चुका है। नई इंटरनेट अर्थव्यवस्था में तमाम बड़ी कंपनियों के लिए उपयोक्ताओं से जुड़ी सूचनाएं ही सबसे बड़ी पूंजी है। फेसबुक, गूगल, याहू सभी को इस श्रेणी में रखा जा सकता है। 'गूगल' के पास तो इतना डाटा है कि उसका दुरुपयोग लगभग तबाही मचा सकता है। 'गूगल' का एकाधिकार महत्वपूर्ण प्रश्न है। लेकिन, इस लड़ाई के बीच हम क्या करें? बड़ा सवाल यही है कि क्या हमारे उपयोक्ताओं के पास दूसरे बेहतर विकल्प हैं ?

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