Wednesday, 9 January 2013

शराब पीकर भी होश में रहने वाला संन्यासीः ओशो



जब मैं कहता हूं, झुकने में आनंद है तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या ऐसे लोगों के चरणों में भी झुका जाए, जो गलत हैं; या उन चरणों में झुका जाए जो सही हैं? जटिल सवाल है; क्योंकि तुम कैसे तय करोगे कि कौन-से चरण सही हैं और कौन-से गलत हैं? जो हजारों लोग कहीं झुक रहे हैं, वे सही मानकर ही झुक रहे हैं, नहीं तो वे भी न झुकते। तुम्हें गलत दिख रहा है, इसलिए झुकने में अड़चन मालूम हो रही है। तुम मेरे पास झुक गए हो; लेकिन हजारों लोग तुम्हें मिल जाएंगे, जो मुझे गलत मानते हैं और मेरे चरणों में नहीं झुक सकते हैं।

तो, क्या ऐसा कोई मापदंड है, जिस पर तराजू हो, तुल जाए और तय हो जाए कि कौन सही है; एक दफे तय हो जाए, सब वहीं झुक जाएं; या तय हो जाए कि कौन गलत है? यह तो असंभव है। यह तय हो नहीं सकता। इसके तय होने का कोई उपाय नहीं है। मनुष्य इतना रहस्यपूर्ण है कि कोई कसौटी उसे कस नहीं पाती; वह सोने की तरह उथला नहीं है कि कस लिया और पता चल गया।

फिर एक को जो व्यसन मालूम पड़ता है, दूसरे को व्यसन न मालूम पड़े। मैं एक अघोरपंथी संन्यासी को जानता हूं, जो शराब पीने में अतिकुशल हैं और जिनकी जिंदगी करीब-करीब प्रार्थना में नहीं, वेश्याओं के नृत्य देखने में गुजरी। लेकिन वह ब्रह्मचारी हैं, यह भी मैं जानता हूं और उन-जैसा ब्रह्मचारी मैंने देखा नहीं। वेश्याओं का नृत्य वह इसलिए देखते रहे हैं- वह उनकी साधना का हिस्सा है।

शराब वे पीते हैं और डटकर पीते हैं; लेकिन उनको कभी किसी ने बेहोश नहीं देखा। वह उनकी साधना का अंग है कि शराब प्रभावित न करे; ध्यान इतना गहन हो जाए कि शराब शरीर को भले डुबा दे, ध्यान को न डुबा पाए, ध्यान शराब के सागर के ऊपर भी पृथक् खड़ा रहे, अतिक्रमण करता रहे। ये पुराने तंत्र के प्रयोग हैं। साधारणः ऊपर से देखने में बड़ी कठिनाई होगी।

वे बनारस में रहते हैं। मैं एक मित्र के घर मेहमान था। मैंने उनसे कहा कि उनके पास मुझे ले चलो, या उन्हें खबर कर दो तो वे चले आएंगे। उन्होंने कहा-यह तो कृपा करें। उनको यहां तो हम न बुला सकेंगे। मुहल्ले-पड़ोस में...। हम गृहस्थ आदमी हैं; और उनका नाम आप जानते हैं, किस तरह बदनाम है! और इधर हमारे घर में आएंगे तो आपकी भी बदनामी होगी, हमारी भी बदनामी होगी। और हम तो सलाह देते हैं कि आप भी वहां न जाएं। फिर भी आपको जाना हो तो ड्राइवर आपको ले जाएगा, मैं साथ नहीं आ सकता।

मुझे तो जाना था, उनसे मिलना था, बहुत वर्ष हुए मिला नहीं था-तो गया। मगर उस दिन से जिनके घर में रुका था, उनसे मेरा संबंध टूट गया, क्योंकि मैं गलत हो गया! जब गलत आदमी के पास मैं गया और उनके चेताने पर गया तो सारा फर्क हो गया। लौटकर घर आया, उस घर में मेरा कोई सम्मान न रहा। कैसे तय करोगे? तय करने का क्या उपाय है? किसी को एक बात ठीक लगती है, किसी को ठीक नहीं लगती।

पुस्तकः बोले शेख फरीद
प्रवचन नं. 4 से संकलित
साभारः ओशो वर्ल्ड फाउंडेशन


परिचयओशो रजनीश का जन्म 11 दिसम्बर 1931 को मध्य प्रदेश में रायसेन जिला के अंतर्गत कुचवाड़ा ग्राम में हुआ। ओशो अपने पिता की ग्यारह संतान में सबसे बड़े थे। 1960 के दशक में वे 'आचार्य रजनीश' एवं 'ओशो भगवान श्री रजनीश' नाम से जाने गये। ओशो ने सम्पूर्ण विश्व के रहस्यवादियो, दार्शनिको और धार्मिक विचारधाराओं को नवीन अर्थ दिया। अपने क्रान्तिकारी विचारों से इन्होने लाखों अनुयायी और शिष्य बनाये। 19 जनवरी 1990 को ओशो परमात्मा में विलीन हो गये।  

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