Monday, 7 January 2013

जवानी के दौर में

(वो आख़िरी कविता थी)

वह बुढ़ा पहाड़ का कवि था
हिमपात के इन आख़िरी महिनों में
वह खाँसता हुआ लिखता था
उसने अपनी जवानी के दौर में
सहारा के बंज़ारों के साथ लिखा
उमस, सीलन और फफूंद भरे तिनकों के
पेरू-चिली-बोलिवियाई त्रिकोणी वृक्षावनों में
मुँह पर चिपके मकड़ी के जालों को लिखा
हिमालय के निर्जन बौद्ध मठों के कंगूरों से
विलुप्ति की कगार से लुढ़क चुकी
खोहों में ठिठुरती संस्कृतियों का पलायन लिखा
ठंडे साईबेरियाई पहाड़ों को पार करते हुए
उसने सुदूर-
चाँद के सबसे क़रीब इस पहाड़ पर
पहाड़ की निर्जन और जर्जर झोपड़ी पर
एक पड़ाव लिखा, अपना बुढ़ापा लिखा
हां! उसने यहीं तक लिखा।

चाँद से अपने समझौते के तहत
हिमपात की सबसे भयानक रातों में भी
उसने खाँसते हुए खिड़कियाँ खोली थीं
कागज पर सियारों की हुंआ-हुंआ लिखकर
उसने आश्वस्त चाँदनी को अलविदा कहा
जंगल जल रहे थे, लकड़ियाँ कम थीं
अपनी कविताओं को अंगीठी में जलाकर
कवि ने झूठ लिखा, अपना स्वार्थ लिखा।

इस बरस के हिमपात की यह आख़िरी रात है
बुढ़े कवि ने खाँसते हुए अपनी आख़िरी पंक्ति से
और खाँसी ने अपने ढ़ेर सारे खून के थक्कों से
जब कागज़ और कविता को लहूलुहान कर दिया
बुढ़ा कवि ज़ोर से काँपा, कुर्सी सहित पलट गया।

और सदियों बाद आज खिड़की से पहले दरवाज़ा खुला
वह बंद दरवाज़े का सच था, जंगल से भागा हुआ
एक बुढ़ा और घायल शेर, वह अपनी ज़मीन का सच था।

चाँदनी के पास आज ढ़ेर सारे प्रश्न थें
उसने कवि के लिए पूछा, -वह ज़मीं पर क्यों हैं?
बुढ़े शेर ने कहा, -आज वह अपनी सही जगह है!
चाँदनी ने सबसे मुश्किल सवाल पूछा, -कविता कहाँ हैं?
बुढ़े शेर ने खाँसते हुए इशारा किया-
अंगिठी में जल रहे कागज़ की ओर किया, -वह वहाँ है!
और उस रात चाँदनी ने भी स्वीकार किया-
ओह! तो क्या आखिरी जंगल भी जल गया?
(और कहते हैं कि उस रात के बाद चाँदनी
कभी भी अपने चाँद के पास नहीं लौटी)

-- मनास ग्रेवाल।

0 comments:

Post a Comment