अनुराग बत्रा, चेयरमैन एंड एडिटर-इन-चीफ, एक्सचेंज4मीडिया.कॉम
हाल ही में फिर से दूरदर्शन के दिन लौट आए, 1 नवंबर 2012 को चार महानगरों में केबल टेलीविजन के डिजिटलीकरण के बाद से जब लगभग 1 लाख सेट टॉप बॉक्स की कमी हो गई। दर्शकों के सामने दूसरा कोई ऑप्शन (विकल्प) नहीं था, तब दर्शक सिर्फ दूरदर्शन के दो चैनल दूरदर्शन नेशनल और डीडी न्यूज़ पर ही शाम में समाचार देखने लगे थे।
जिस किसी ने ‘दूरदर्शन – नेशनल चैनल ऑफ इंडिया’ लिखा है, को एक बार फिर से सोचने की जरूरत है। फिल्म से लेकर सभी के लिए जरूरी शिक्षा पर बहस, हर चीज यहां मौजूद है। कुछ समय पहले तक इस पर गुणवत्ता की कमी थी, जो धीरे-धीरे ही सही एक बार फिर से लौट रहा है, जो दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले शो से मालूम होता है। वास्तव में, दूरदर्शन ने एक लंबा सफर तय किया है। यह मनोरंजन और ज्ञान का एक मात्र ऐसा जगह है जहां कई सारे चैनलों के गुलदस्ता उपलब्ध हैं और समाचार से लेकर, विचार, एंटरटेनमेंट सूचना सभी कुछ प्राप्त होता है। आज इसकी पहुंच भारत के 92 प्रतिशत भागों में है और इसके दर्शकों की संख्या 2.5 करोड़ के लगभग है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि दूरदर्शन की पहुंच दूसरे अन्य चैनलों की अपेक्षा सबसे अधिक है।
दूरदर्शन पर, टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, यह ना सिर्फ एक टेलीविजन चैनल है, “सरकार भी प्रिंट और रेडियो के क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहती है। 2014 में लोकसभा के चुनावों को देखते हुए निश्चित तौर पर सरकार को अपना मीडिया होने से लाभ मिलेगा।”
समाचारपत्रों के अनुसार, पंजाब और गुजरात सरकार अपना टेलीविजन चैनल लाना चाहती है जबकि मानव संसाधन मंत्रालय अपने डीटीएच प्लेटफॉर्म पर शैक्षणिक चैनल लाना चाहता हैं और इसके लिए सभी ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से मदद मांगी है।
30 साल के उपर के सभी लोगों को दूरदर्शन या डीडी की लोकप्रियता के बारे में पुरानी यादें जुड़ी हुई है। हम में से अधिकांश को याद होगा कि दूरदर्शन सिनेमा, थिएटर, फेयर्स और मेला जहां वास्तव में दृश्य मनोरंजन उपस्थित थे, के अलावा यह एक मात्र संस्थान था।
उसके बाद, वीसीआर, फिर सीडी और कई चैनल आए जो मनोरंजन पर अपना ध्यान ज्यादा फोकस कर रहे थे, ऐसे में डीडी से दर्शक दूर होते चले गए, क्योंकि इसके कार्यक्रम नई पीढ़ी को अपील नहीं कर पा रहे थे। इस तरह से यह धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा था। लंबे समय तक यह घाटे में रहा और फिर सरकार ने प्रसार भारती नाम से एक स्वायत्त संस्था का गठन करके सार्वजनिक क्षेत्र के प्रसारक संस्थान – दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो को इसके अंतर्गत ला दिया।
एक अनुमान के अनुसार, सार्वजनिक क्षेत्र का यह प्रसारण संस्था पांच वर्षों तक घाटे में रहा और अब खतरे की घंटी बजने लगी थी। अगस्त 2012 में राज्यसभा में सरकार ने एक प्रश्न के जवाब में कहा कि प्रसार भारती को 2009 से 4,224.55 करोड़ का घाटा हुआ है।
मंत्रियों के समूह जो प्रसार भारती के वित्तीय, कर्मचारी और प्रशासनिक विभागों को देखता है, ने सरकार से अपील की कि वे इसे गैर-योजना मद से वित्तीय सहायता दें जिससे कि 2011-12 से लेकर 2015-16 तक वेतन संबंधी खर्चे पूरा किया जा सके।
चाहे कुछ भी हो दूरदर्शन में बदलाव देखने को मिल रहा है। हालांकि, दूरदर्शन को सत्ता का समर्थक माना जाता है, इसका अधिकार सरकार के हाथों में है। उदाहरण के तौर पर हम देख सकते हैं कि लोकपाल बिल या अन्ना हजारे के समय डीडी न्यूज़ पर टीकर से काम चला लिया गया जबकि अन्य निजी चैनलों पर जोरदार तरीके से बहस आयोजित की गई। नेशनल न्यूज़ चैनल एकदम से बीबीसी की राह पर तो नहीं चल सकता है लेकिन कम से कम निष्पक्ष सूचना, टिप्पणी या विचार तो दे ही सकता है।
जैसा कि शिखा नेहरा ने अपने ब्लॉग, ‘दव्यूज़पेपर.नेट’ में लिखा, “24 घंटे सातों दिन चलने वाले समाचारपत्र अधिक से अधिक टीआरपी के चक्कर में एक-दूसरे से प्रतियोगिता करते हैं। डीडी न्यूज़ इन सभी प्रतियोगिता से अप्रभावित है। वर्षों से, जहां निजी चैनल दर्शकों को खुश करने के लिए हर संभव कदम उठाने का प्रयास करते हैं। डीडी न्यूज़ को इसकी कोई फिक्र नहीं होती है, कोई इसे देख भी रहा है कि नहीं।”
दूरदर्शन अन्य निजी चैनलों की अपेक्षा समाचारों के प्रजेंटेशन में उन्माद और सनसनीकरण से बचता है और अब न्यूज़ और बहस में पहले से बेहतर प्रस्तुति देखने को मिल रही है, जो समग्र तौर पर जीवंत बन दिख रहा है।
प्रसार भारती के सीईओ, जवाहर सरकार ने नवंबर में कहा था कि नेशनल ब्रॉडकास्टिंग नेटवर्क के सुधार के लिए 500 करोड़ का एर कार्यक्रम शुरू किया गया है। उन्होंने आगे कहा कि वर्तमान वैश्विक माहौल में अन्य चैनलों के साथ कड़ी टक्कर देने के लिए सरकारी मीडिया के संपूर्ण प्रक्रिया जिसमें ब्रॉडकास्टिंग और टेलीकास्टिंग न्यूज़ और अन्य कार्यक्रम शामिल है, का लोकतांत्रिकरण नहीं किया गया तब तक यह मुश्किल है।
लेकिन समस्या यह है कि भारत के 92 प्रतिशत घरों में अपनी पहुंच रखने के बाद भी दूरदर्शन प्रसारकों के द्वारा प्रतिवर्ष कमाए जाने वाले 15,000 करोड़ रुपये में से मात्र 10 प्रतिशत यानि 150 करोड़ रुपये ही प्राप्त कर पाता है। इसके अलावा, दूरदर्शन सिर्फ उन्हीं उत्पादों को तरजीह देता है जो ग्रामीण क्षेत्रों को अपना लक्ष्य करते हैं और इस तरह से मीडिया प्लानर्स और एडवरटाइजर्स के लिए कम स्कोप होता है।
बिजनेस स्टैंडर्ड की नज़रों में दूरदर्शन की मुख्य समस्या ‘अस्पष्ट’ और ‘विरोधाभाषी’ होना है। समाचारपत्र ने एक टेलीविजन चैनल के सीईओ का हवाला देते हुए लिखा है, “दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले सिनेमा और मनोरंजन जगत पर लगभग 70 प्रतिशत कार्यक्रम जिसे सीधे निजी चैनलों से प्रतियोगिता होती है, निजी चैनल इनसे बेहतर कार्यक्रम करते हैं। सार्वजनिक प्रसारक के सामने सबसे बड़ी समस्या है यह।”
पब्लिक ब्रॉडकास्टिंग नेटवर्क की दूसरी समस्या यह है कि इसके पास एडवरटाइजिंग बिल्कुल नहीं है।
इन सभी कमियों के बावजूद, डीडी के प्रेमी इस बात से सहमत हैं कि अन्य निजी चैनलों की अपेक्षा दूरदर्शन में अच्छाई भी है।
हाल के दिनों में इस पर कुछ अच्छे शो का प्रसारण भी किया गया जैसे कि ‘सत्यमेव जयते’। हालांकि, ‘स्टार टीवी’ के साथ इसे राजस्व का साझा करना पड़ा, लेकिन दूरदर्शन के लिए यह काफी अच्छा अवसर था। इसी तरह से ‘कोक स्टूडियो’ शो से दूरदर्शन को 14 करोड़ रुपये की आय प्राप्त हुई।
इन पहलुओं को देखते हुए दूरदर्शन को एक लंबा सफर तय करना है जिससे कि अधिक से अधिक दर्शक इससे जुड़ सके। मार्केट रिसर्च, शो की गुणवत्ता पर ध्यान देना होगा तथा साथ ही इसे शहरी भारत पर ध्यान देने के साथ ही क्रिएटिव और इनोवेटिव भी होना पड़ेगा।











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