Monday, 7 January 2013

आम जन के मौलिक अधिकार को ताकत देता है 'कैनविज टाइम्स'


प्रभात रंजन दीन

आम जन के मौलिक अधिकार को ताकत देता है 'कैनविज टाइम्स' में दिल्ली-पीडि़ता के नाम का प्रकाशन
सार्थक बदलाव का ज्योति-संदेश है यह...

यह समय अभूतपूर्व एकता दिखाने और एक साथ आगे बढऩे का समय है। दिल्ली हादसे की भुक्तभोगी छात्रा ज्योति का नाम 'कैनविज टाइम्स' ने प्रकाशित किया। उसके पिता ने दो विदेशी पत्रकारों से यह कहा कि वे चाहते हैं कि उनकी बिटिया का नाम दुनिया जाने जिससे दुनियाभर की महिलाओं को उत्पीडऩ के खिलाफ लडऩे का साहस मिले। 'कैनविज टाइम्स' ने उस चाहत का सम्मान रखा। देश भी यही चाहता था। विदेशी छापें तो ठीक लेकिन देश में न छापने जैसी नासमझ 'बौद्धिक सलाहों' ने ही देश का कबाड़ा कर रख दिया है। 'कैनविज टाइम्स' पूरे दम से और साहस से आम आदमी के साथ खड़ा है। इस दम में कोई छद्म नहीं है। यह दम एक आम आदमी की चाहत और लोकतांत्रिक देश में संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति के मूल अधिकार के आगे किसी भी अड़चन की परवाह नहीं करता। यह दम समाज को भी देना होगा। जिस छात्रा ने खुद का उत्सर्ग कर पूरे देश को जागरूकता की ज्योति दी, जिसके सम्मान में पूरा देश आज भौतिक और भाव रूप दोनों से एकसूत्रित हो गया है, उस स्वर्गीया का नाम क्यों नहीं छापें? अब देश को बेमानी के थोपे हुए बेजा कानूनी बोझ से उबरना होगा। आजादी के बाद से लोगों को न्याय तो मिला नहीं, मिली केवल भारी-भारी शब्दावलियां, अवमानना और विशेषाधिकार का अवांछित बोझ और आम आदमी का अपना अधिकार इस बोझ के नीचे कुचला जाता रहा। उस बेटी जिसका नाम ज्योति सिंह पांडेय है, वह पूरे देश की बेटी है। सम्पूर्ण देश ने ज्योति को अनामिका, दामिनी, निर्भया या किसी और नाम से, उसे बेटी के रूप में ही स्वीकार किया है। देश ने उसे नाम ही तो दिया! फिर उस श्रद्धेया स्नेहिला ज्योति का नाम देश के सामने लाने पर कुछ लोगों को ऐतराज क्यों? ऐसे लोग बेटियों के प्रति नहीं, समाज के प्रति नहीं, मानवधर्म के प्रति नहीं बल्कि सत्ता के प्रति ठेकेदार-भाव से परिपूर्ण छोटे लोग हैं... ऐसे लोग हर समाज में होते हैं, समाज को ऐसे लोगों की उपेक्षा कर आगे बढ़ते चलना चाहिए... अगर अप्रासंगिक, अनौचित्यपूर्ण और अनपेक्षित व्यवस्था को बदलना हो तो! 

मरहूमा ज्योति सिंह पांडेय, उनके पिता बद्री सिंह पांडेय, ज्योति की मां श्रीमती आशा सिंह पांडेय और भाइयों गौरव और सौरभ का नाम 'कैनविज टाइम्स' में प्रकाशित करने पर समाज में जबरदस्त सकारात्मक प्रतिक्रिया हुई। पाठकों की तरफ से ऐसे भी संदेश आए कि वे समवेत रूप से 'कैनविज टाइम्स' के साथ खड़े हैं, क्योंकि व्यवस्था बदलने में ऐसी पहल उत्प्रेरक-तत्व (कैटेलिटिक एजेंट) की तरह काम करती है। फेसबुक जैसे सोशल नेटवर्क पर तो प्रतिक्रियाओं के आने का सिलसिला यह संदेश लिखे जाने तक जारी था। जो प्रतिक्रियाएं हमें मौखिक मिलीं, उसका भाव आपको बता दिया। लेकिन जो प्रतिक्रियाएं फेसबुक पर मिलीं, वे लिखित तौर पर सामने हैं, उसमें से कुछ प्रतिक्रियाएं हम आपके समक्ष भी पेश कर रहे हैं। यह दीया है, इसकी लौ से लौ मिला कर दावानल खड़ा करना है समाज को...

आनंद अखिला ने फेसबुक पर लिखा है कि 'कैनविज टाइम्स' ने ज्योति का नाम प्रकाशित कर बिल्कुल सही कदम उठाया है। यह नया सामाजिक कदम है। पहले नाम इसलिए छुपाया जाता था कि इसे महिलाओं के ऊपर किया गया घृणित कार्य माना जाता था, पर कोई लडऩे के लिए तैयार नहीं होता था। समय के साथ यह बदला। अब महिलाएं लडऩे के लिए आगे आ रही हैं। घृणा के पात्र वे पुरुष हैं जो ऐसा कृत्य करते हैं, वे महिलाएं नहीं जो इसका शिकार बनती हैं। 'कैनविज टाइम्स' ने जो पहल की है, उससे यह संदेश गया है कि महिलाओं में साहस बढ़ेगा और वे अपना नाम छुपाने के बजाय लडऩे के लिए सामने आएंगी। 'डिप्रेशन' में नहीं चली जाएंगी बल्कि लड़ेंगी अपने नाम के साथ। 

संजय मिश्रा लिखते हैं कि उन्हें अच्छा लगा देश की बेटी का नाम जानकर। श्री मिश्र इस पहल के लिए 'कैनविज टाइम्स' के प्रति आभार भी जताते हैं और कहते हैं, 'बेमानी के कानूनी फतवों को धता बताने के लिए शुक्रिया।' संजय मिश्र ने उन डरपोक मीडियाकर्मियों पर कटाक्ष भी किया जो समाज के प्रति उत्तरदायित्व निभाने के बजाय कायर बने रहते हैं और इसे ढंकने के लिए कुतर्क गढ़ते हैं। सैयद अज़ीम अब्बास रिज़वी ने 'कैनविज टाइम्स' में छात्रा और उसके परिवार का नाम प्रकाशित किए जाने को उचित फैसला कहा। वे लिखते हैं कि अदम्य साहस दिखाने के लिए ज्योति का परिवार अभिवादन के लायक है। पूरे देश को यह जानने का हक है कि वह कौन सी लड़की थी जिसके साथ ऐसी निर्लज्ज हरकत की गई जो भारतीय सभ्यता पर शर्म और कलंक है। श्री रिज़वी ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत का नाम लिए बगैर भारत और इंडिया में बलात्कार का फर्क बताने पर तीखा प्रहार किया है। उन्होंने राज ठाकरे को भी आड़े हाथों लिया और कहा कि ठाकरे को यह समझना चाहिए कि ज्योति सिंह पांडेय एक भारतीय थीं और भारतीयों ने ही उनके साथ ऐसी गलीज हरकत की।

उत्तर प्रदेश में सरकारी अधिकारी अशोक सिन्हा 'कैनविज टाइम्स' की इस पहल पर साधुवाद देते हैं। वरिष्ठ पत्रकार राजीव ओझा लिखते हैं, 'कैनविज टाइम्स ने इसे प्रकाशित कर ज्योति को सच्ची श्रद्धांजलि दी है।' पत्रकार अरुणिमा सोनी बस एक शब्द में अपनी अभिव्यक्ति देती हैं, वे कहती हैं 'पेनफुल' (दर्दनाक)। वरिष्ठ पत्रकार आवेश तिवारी इस पहल को 'ग्रेट' (महान) बताते हैं तो मानव सुभाष 'कैनविज टाइम्स' को सच का सिपाही बताते हुए अभिवादन करते हैं। अरशद नकवी, दानिश आज़मी व 14 अन्य लोग भावावेश में कहते हैं कि ज्योति के साथ ऐसा करने वालों, या किसी भी महिला के साथ ऐसी हरकत करने वालों को फौरन फांसी पर चढ़ा दिया जाना चाहिए।
'कैनविज टाइम्स' की इस पहल पर दिल्ली में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन में व्याख्याता कृष्ण कुमार शर्मा फिल्मी गीतकार प्रसून जोशी की कविता की भावुक पंक्तियों का जिक्र करते हैं, जिसमें एक बिटिया अपने पिता से बड़े संकोच से कहती है मुझे सोनार के घर मत ब्याहना, व्यापारी के घर मत ब्याहना, मुझे लोहार के घर ब्याह देना जो मेरी जंजीरें पिघलाए...
राजवीर सिंह लिखते हैं कि 'कैनविज टाइम्स' का यह प्रकाशन उनके दिल को छू गया। उन्होंने इसकी सराहना के और भी शब्द लिखे। इसके अलावा उन्होंने साहस की प्रतिमूर्ति ज्योति को एक भावुक कविता भी समर्पित की है। इसके साथ ही उन्होंने ज्योति के साथ ऐसा आचरण करने वाले देश पर लानत भेजते हुए यह भी कहा, 'अच्छी परी तुम अब स्वर्ग में हो... नर्क से मुक्त होकर।'
सैयद कासिम लिखते हैं कि दामिनी कहें या अनामिका या ज्योति, देश की उस बेटी के साथ जो हुआ वह अफसोसनाक घटना है, लेकिन देश के मीडिया को इससे पहले भी और बाद में भी होने वाले ऐसी घटनाओं पर उतनी ही तल्खी से सामने आना चाहिए। जिन भी बेटियों के साथ ऐसा होता है, वे बेटियां तो भारत की ही हैं। कासिम 'कैनविज टाइम्स' की पहल को दिल को छू लेने वाला बताते हैं। काज़ी फुरकान कहते हैं कि अनामिका या ज्योति की मौत एक ऐसा दर्द है जो कम ही नहीं होता। लेकिन मीडिया को ऐसे सारे मामलों को एक ही नजर से देखना चाहिए... तो शायद दर्द कम हो सके। अम्बुज कुमार 'कैनविज टाइम्स' की पहल को बेहतरीन बताते हैं तो पत्रकार-लेखक अमित त्यागी 'कैनविज टाइम्स' में प्रकाशित ज्योति के पिता के संवाद की कुछ भावुक पंक्तियां दोहराते हुए अपनी भावना व्यक्त करते हैं। 

इसके अलावा अनुजेश सिन्हा, हिमांशु सिंह मोनू, कुमार संजय, कृष्ण कुमार शर्मा, सैयद रिजवान मुस्तफा, आशुतोष पांडेय, अखिलेश ठाकुर समेत दर्जनों ऐसे लोग हैं जिन्होंने 'कैनविज टाइम्स' के पेज को फेसबुक पर अपने मित्रों के साथ शेयर किया है। दिल्ली हादसे की भुक्तभोगी ज्योति सिंह पांडेय के पिता बद्री सिंह पांडेय की इच्छा का आदर करते हुए उसे 'कैनविज टाइम्स' में प्रकाशित किए जाने को सैकड़ों लोगों ने पसंद किया और बाकायदा 'लाइक' का बटन दबाया। उन सबका नाम प्रकाशित नहीं कर पा रहे हैं, लेकिन देश-समाज के संजीदा लोगों में वे शामिल तो हैं ही। हम उन सबके प्रति सम्मान ज्ञापित करते हैं। इन संवेदनशील लोगों और हमारे संजीदा पाठकों की प्रतिक्रियाएं, संदेश या सांकेतिक अभिव्यक्तियां सार्थक बदलाव के प्रति ठोस संदेश दे रही हैं... और यही तो ज्योति सदृशों के लिए सच्ची श्रद्धांजलि भी होगी!

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