Sunday, 27 January 2013

किसी गांव सा था वो, शहर में गुज़र गया


किसी गांव सा था वो, शहर में गुज़र गया
- चण्डीदत्त शुक्ल

गूगल पर केसी महंथ के बारे में कुछ तलाश रहा हूं। यह जानते हुए कि कुछ नहीं मिलेगा। एक भी रिजल्ट नहीं। वैसे, ये बेहद बेशर्मी, आलस्य और अपनी जड़ों से कट जाने वाली हरकत है। पर क्य़ा कहूं। ऐसा ही है। हो सकता है, कल को ये दिन भी आए कि लोग अपने मां-बाप के बारे में भी गूगल पर इन्फो तलाशने लगें। हम अपनी मिट्टी ऐसे ही भूलते जा रहे हैं। आज सुबह ही खबर मिली कि महंथ जी नहीं रहे। वो मां-बाप तो नहीं पर पता नहीं क्या-क्या थे। गोंडा में रहते हुए, जब पत्रकारिता की एबीसीडी पढ़नी चाही तो एक वही थे, जिन्होंने शुरू-शुरू में आतंक नहीं दिखाया। यह नहीं कहा था कि पत्रकार कोई तोप होते हैं, या ये कि तू चीज ही क्या है? इतने ही सीधे-सादे, सच्चे, घर-दुआर वाले प्राणी थे महंथ जी। इतने अपने कि उन्हें `थे' लिखते हुए भी तकलीफ हो रही है... पर वही महंथ साहब, अब नहीं हैं, और जब उन पर कुछ लिखने को मन कचोट रहा है तो कुछ भी याद नहीं आ रहा... न उनका जन्म, न कोई सेलेब्रिटी इन्फो। इस तरह का साधारण क्या होना कि दिखावे की दुनिया में आपके बारे में इन्फॉर्मेशन ही न मिले? कुछ तो जलवे बिखेरते, एमपी-एमएलए-मिनिस्टर-चीफ मिनिस्टर पटाते, अवार्ड-शेवार्ड हासिल करते, बंगला एलाट करवाते...। ख़ैर, महंथ साहब चले गए। गोंडा कचहरी में आपकी गुमटी के पास पुराने बूढ़े मुंशी जी तो फिर बैठेंगे और शायद कोई आपका जूनियर गद्दी संभाले, मुकदमे की पेशियां अटेंड करे, लेकिन खांटी गंवई वाली आपकी मुस्कान कहां मिलेगी?

गोंडा शहर की कुछ पुरानी-धुंधली शामें याद आ रही हैं। सिविल लाइंस में पुराने, पीले रंग का मुरझाया सा एक बड़ा बंगला। उसमें एक कमरा, जिसकी खिड़कियों से छनकर सुबह की रोशनी सकुचाते हुए अंदर आती थी और मेज़ के सामने सीधे-सधे हुए सादगी के साथ बैठे महंथ साहब। सरिता मैगज़ीन में छपे अपने लेखों और कहानियों के बारे में, बेहद विनम्रता से बताते। कोई डींग नहीं, मक्कारी नहीं, कहीं-कोई बड़प्पन नहीं। फैज़ाबाद के जनमोर्चा अखबार के ज़िला गोंडा में सर्वेसर्वा पत्रकार थे। अरसे तक रहे। 

लोग इज्ज़त करते थे उनकी। सिर्फ दिखाने के लिए नहीं। दिल से छलक उठने वाली इज्जत।
याद आता है, एक शाम कहने लगे थे - चण्डीदत्त! मक्कारी से हासिल की दौलत नहीं रुकती। ऐसी शोहरत भी नहीं टिकती। उनकी इस बात का मैंने कितना सबक लिया, क्या कहूं पर यह बात तो याद है। आज महंथ जी चले गए हैं, लेकिन उनसे फ्री में मिली पत्रकारिता की ट्रेनिंग एकदम पक्की है, जीवंत है, कभी नहीं छूटेगी। वे नहीं हैं पर वो मिट्टी बाकी है, जो फीचर राइटिंग का वज़ूद बताती है। इन दिनों पढ़ता हूं, किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम की कवरेज लिखते हुए पत्रकारों का फ़ेवरिट वाक्य होता है -- और उन्होंने मंत्रमुग्ध कर दिया... या फिर -- और उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। ऐसे मौकों पर महंथ जी की कलम से निकले शब्द चौंका देते हैं। वे लिखते थे, तो उनमें अफसाने होते थे, हमारा समय, उसकी चुनौतियां, गांव-देहात की लोक परंपरा और गीत तक। वे कटकर नहीं रचते थे, शब्द उनके साथी थे। क्योंकि उन्होंने समय जिया था। जाना था कि संबंध क्या होते हैं, क्या होती है मोहल्ले की, शहर की और हमारे कसबों की ज़िंदगी। परंपराओं की तरह होते हैं कुछ चेहरे। कुछ एहसास, कभी नहीं मरते। आप भी याद आते रहेंगे महंथ साहब। आख़िरी सलाम!

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